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स्काईवॉक और मार्निंग वॉक

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skywalk-and-morning-walk संडे को पूरे दिन आराम फरमाने के बाद मंडे की सुबह सुबह जब मंगूराम अपनी चाय की गुमठी खोलने पहुंचें तो वहां शर्माजी को तेजी से टहलते पाया..मंगूलाल का लगा कि एक दिन के आराम से वो आराम तलब हो गए हैं

संडे को पूरे दिन आराम फरमाने के बाद मंडे की सुबह सुबह जब मंगूराम अपनी चाय की गुमठी खोलने पहुंचे तो वहां शर्माजी को तेजी से टहलते पाया..मंगूलाल को लगा कि एक दिन के आराम से वो आराम तलब हो गए हैं...नहीं तो  गुमठी खुलने के घंटेभर बाद ही शर्माजी नजर आते थे..आज से उनसे पहले आकर यहां वहां के चक्कर लगा रहे हैं..लगता है घड़ी लेट हो गई।


कोई बात नहीं..जब कुछ समझ में नहीं आया तो मंगूराम सिर हिलाते हुए गुमठी की सफाई में लग गए...भट्टी भी सुलगानी थी, क्या पता कब कौन चाय प्रेमी टपक पड़े। वैसे भी आज वो लेट हो गए हैं। काफी देर तक कोई चाय प्रेमी गुमठी में नहीं पहुंचा तो .मंगूलाल सोच में पड़ गए..आज ऐसा क्या हो गया कि आधी भट्टी राख हो गई..भला बासी चाय कौन पीने आएगा..। और शर्माजी रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं..कुछ पूछे तो कैसे..।



प्रदीप शर्मा @9329360373


थोड़ी देर में बीड़ी सुलगाते हुए खबरीलाल वहां टपके तो मंगूलाल को थोड़ी हिम्मत आ गई, एक से भले दो..चलो शर्माजी से यहां वहां के चक्कर लगाने का कारण मालूम कर ही लेते हैं। शर्माजी की ओर इशारा करते हुए मंगूराम ने खबरीलाल से कहा..देखो वो यहां वहां के चक्कर क्यों लगा रहे हैं, पहले तो ऐसा नहीं करते थे। बात भी ठीक थी..दोनों के सिर हिले, हॉ भाई पता करना ही पड़ेगा। आखिरी शर्माजी ऐसे ही नहीं यहां वहां चक्कर नहीं लगाते।


परेशानी ये थी कि, बात कहां से शुरु करें किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था..वैसे भी शर्माजी के तेवर ​किसी मंत्री से कम थोड़े ही थे..क्या पता वो कब फट पड़े..वैसे भी गुमठी में  कुल मिलाकर दो लोग ही थे, ज्यादा लोग होते तो कोई न कोई बात को संभाल लेता..। आखिर में मंगूराम हिम्मत लगा के शर्माजी को आवाज लगा दी..शर्माजी गरमा गरम चाय तैयार है..आइए ना कितनी देर से आपका इंतजार कर रहे हैं।


अब बस जो नहीं होना था वही हुआ..शर्माजी गरमा गए..बोले अरे नाहक आवाज देते हो मंगूलाल, जरा भी तमीज नहीं है..देखते नहीं अभी मैं मार्निंग वॉक पर हूं। मंगूलाल सकपका गए, मगर खबरीलाल कहां मानने वाले थे वो घर से पूरा अखबार चट कर गुमठी पहुंचे थे। वो बोल पड़े, शर्माजी काहे को गरम होते हो पूरा शहर इस समय स्काईवॉक को लेकर परेशान है और आप मार्निंग वॉक पर टिके हो..।


थोड़ी देर तक शर्माजी भी चुप रहे..वैसे भी यहां वहां के चक्कर लगा लगा कर वो भी हांफने लगे थे..अगर चाय मिल जाए तो थोड़ी राहत भी मिलेगी.. ऐसा सोच कर वो गुमठी तक आ गए..अच्छा चलो गरमा गरम चाय पिला ही दो..। चाय की चुस्की के साथ शर्माजी के चेहरे की रंगत भी बदल रही थी..यानि बात बन जाने के पूरे चांस थे..। मौका देखकर खबरीलाल बोले, शर्माजी मार्निंग वॉक तो अच्छी बात है..मगर इतनी सुबह.सुबह..हर चीज का एक वक्त होता है।


शर्माजी को चुप करा देना किसी ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे के बस की बात नहीं.. ये तो खबरीलाल भी जानते थे..मगर यहां वहां का चक्कर भी जानना जरूरी था। शर्माजी नार्मल होकर बोले अरे नहीं खबरीलाल.. तुम कहते हो हर चीज का एक वक्त होता, तो बताओ स्काईवॉक बनाने का भी कोई वक्त होता है..जब जिसे मौका मिला वो स्काईवॉक पर सवार हो जाता है..ये सालों से बन रहा है.. सालों बनता रहेगा, तुम नाहक परेशान हो रहे हो.. मैं मार्निंग वॉक इसी लिए कर रहा हूं जब स्काईवॉक पूरा बन जाएगा तब मार्निंग वॉक की प्रैक्टिस काम आएगी।


वैसे भी अभी स्काईवॉक का जो हाल है उसमें वॉक करने के लिए मार्निंग वॉक की प्रैक्टिस बहुत जरूरी है, नहीं तो एक दो सीढ़ी चढ़ने के बाद ही दम फूलने लगेगा। शर्माजी जब ये फार्मूला बता रहे थे तब तक गुठमी गुलजार हो चुकी थी, करीब दर्जनभर लोग वहां थे। सब बोल उठे, शर्माजी ठीक कर रहे हैं...स्काईवॉक से पहले मार्निंग वॉक जरूरी है। सरकार चलाएगी तो सड़क छोड़ स्काईवॉक पर ही चलना होगा..तो अभी से प्रैक्टिस में क्या हर्ज है..कल से सभी साथ मार्निंग वॉक पर निकलेंगे..आवाज आई... हां हां हम सभी मार्निंग वॉक के लिए तैयार हैं..और आप..खुद ही फैसला कर लें ​क्योंकि सरकार ने स्काईवॉक बनाने का फैसला कर लिया है।

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