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वनों की अंधाधुंध कटाई पर्यावरण तहस-नहस
गौरी शंकर गुप्ता /घरघोड़ा: क्षेत्र में बिगड़ते पर्यावरण को बचाने शासन से लेकर सभी चिंतित दिखाई नजर आ रहे हैं किंतु भ्रष्टाचार एवं इच्छाशक्ति के अभाव में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए में होने के बावजूद वांछित सफलता काफी दूर है। स्पष्ट है कि इस दिशा में ठोस पहल होना चाहिए इसके लिए लोगों में जागरूकता लाने की जरूरत है शासन-प्रशासन पर्यावरण बचाने तमाम उपाय कर रही है चित्र में वनों की अंधाधुंध कटाई हो रही है सरकारी अमला इसे रोक नहीं पा रही है प्रतिदिन वन क्षेत्र कट रहे हैं जिसका घातक परिणाम सबके सामने है।
ऐसा नहीं है कि वनों की कटाई के अनुपात में वृक्षारोपण नहीं कराया जाता प्रति वर्ष वृक्षारोपण में मद में लाखों रुपए होते हैं फिर भी रोपित पौधे दूसरे वर्ष कितनी संख्या में जीवित रह जाते हैं उदाहरण के तौर पर सड़क किनारे वृक्षारोपण कराया जाता है। पौधों की सुरक्षा सीमेंट के खंभे एवं कटीले तार लगाए जाते हैं गर्मी के दिनों में पानी डालने से लेकर चौकसी के लिए चौकीदारों की व्यवस्था भी की जाती किंतु वृक्षारोपण की महत्वाकांक्षी योजना अन्य सरकारी निर्माण कार्यों की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है मसलन घटिया सीमेंट खंबे की खरीदी जो कि लगाते समय ही टूट जाती है या फिर जागरूकता के अभाव में लोगों के द्वारा नष्ट कर दिए जाते हैं.
इस तरह सड़क किनारे वृक्षारोपण की योजना भ्रष्टाचार एवं जागरूकता के अभाव में अब फ्लॉप शो साबित हो रही है उल्लेखनीय है कि अन्य निर्माण कार्यों की भारतीय वृक्षारोपण का भी शासन स्तर पर मूल्यांकन की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रति वर्ष में राशि के अनुपात में जीवित पौधों का परीक्षण कराया जाए एवं दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध ठोस कार्रवाई हो तो बहुत कुछ सफलता की गुंजाइश हो सकती है प्रति वर्ष के अनुसार इस वर्ष भी व्यापक पैमाने पर वृक्षारोपण कराने पर सरकार जोर दे रही है। हजारों की संख्या में पौधे वितरण एवं रोपित किए जा रहे हैं जो पूर्व की भांति कागजी घोड़े साबित होंगे वास्तविकता की धरातल पर परिणाम न्यूनता की ओर आएंगे एक बात गौर करने की है कि शासन द्वारा वृक्षारोपण सड़क किनारे लोक निर्माण विभाग की भूमि पर नहर के किनारे जल संसाधन विभाग की भूमि पर वन विभाग द्वारा कराया जाता है व्यावहारिक दृष्टि से यह देखने में आता है कि खाली भूमि या उपलब्ध भूमि पर वृक्षारोपण बेतरतीब ढंग से कराया दिया जाता है होना यह चाहिए कि जहां भी वृक्षारोपण कराया जाता है।
भूमि का बाकायदा स्वामित्व के आधार पर लोगों द्वारा आवेदन ढंग से कब्जा कर दिए भूमि को वर्षों काल के पूर्व खाली करा लेना चाहिए इससे दो बातें हो सकती हैं पहला शासकीय भूमि से बेजा कब्जा खुद ब खुद हट जाएगा तथा खाली भूमि पर पौधारोपण वर्षों तक सुरक्षित रहेंगे तथा आवागमन की दृष्टि से बाधक नहीं होंगे सन 1977 में राष्ट्रीय वृक्षारोपण योजना के तहत सड़क पर एवं नहर किनारे रोपित पौधे विशाल वृक्ष का रूप धारण कर अनेक स्थानों पर आवागमन में असुविधा एवं बाधक बने हुए हैं उन विशाल एवं फलदार वृक्षों को काटा जाना संभव नहीं है परंतु घरघोड़ा वन परिक्षेत्र अंतर्गत कुछ नहीं है यह जब से वर्तमान परिक्षेत्र अधिकारी पदस्थ हुए हैं तब से जंगली से कीमती वृक्षों की बेहरमी से तस्करों द्वारा कटाई की जा रही जिससे रेंजर की मिलीभगत होने की आशंका होती है?
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