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मरीज के चेहरे पर 10 साल बाद फिर उभरा ट्यूमर, हमीदिया के डॉक्टरों ने हटाया

भोपाल। कभी कभी छोटी सी चोट भी नासूर बन जाती है। यही नहीं कई बार सालों बाद उस छोटी सी चोट का असर सामने आता है। हमीदिया अस्पताल में एक ऐसा ही मामला सामने आया। मरीज को करीब 18 साल पहले सर में चोट लग गई थी। सिर में रक्त की सप्लाई करने वाली नस (आर्टी) में लगी मामूली चोट ने बॉन रेकलिंगीसेन डिसीज नाम की दुर्लभ बीमारी का रूप ले लिया। बीमारी से चेहरे पर सिर के आकार का ट्युमर उभर आया। यहीं नह करीब 10 साल पहले 2014 में मरीज का ऑपरेशन कर इसे हटाया दिया गया। यह ट्यूमर एक बार फिर उभर आया, जिसे हमीदिया अस्पताल में जटिल ऑपरेशन कर हटाया गया। जानकारी के मुताबिक रोजा के रहने चाले अशोक गौतम (42) को करीब 2008 में सिर में मामूली चोट लग गई थी। गौतम ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, बाद में चोट की जगह सूजन होने लगी। हालांकि कुछ दिनों बाद सूजन और बढ़ गई लेकिन गौतम घरेलू उपचार ही करते रहे। इस दौरान यह सूजन बढ़कर सिर के आकार के ट्यूमर में बदल गई। जब स्थिति बिगड़ने लगी से मरीज 2014 में हमीदिया अस्पताल पहुंचा। यहां बर्न एंड प्लास्टी विभाग के प्रोफेसर डॉ. आनंद गौतम ने इस ट्यूमर को हटा दिया।
पहले ट्यूमर में था 5 लीटर गंदा खूनः
डॉ. गौतम ने बताया कि मरीज को चेहरे और गर्दन को ऑक्सीजन युक्त रक्त पहुंचाने वाली प्रमुख धमनी (एक्सटर्नल कैरोटेड आर्टरी) के दाहिने तरफ चोट लगी थी, जिसे सुपर फेसियल टेम्पोरल आर्टरी कहते हैं। चोट के बाद यहां रखून भरने लगा और यह इसका आकार बढ़ने लगा। स्थिति यह हो गई थी कि इस जगह मरीज का साफ और गंदा रखून आपस में मिलने लगा था। जब ऑपरेशन किया गया तब पता चला कि इस जगह करीब पांच लीटर गंदा खून भर कर जम गया था।
लापरवाही से फिर बढ़ा
डॉ. गौतम के मुताबिक 2014 में अऑपरेशन के बाद मरीज को लगा कि वह ठीक हो गया। इसके बाद वह फॉलोअप के लिए नहीं आया। इस दौरान यह ट्यूमर आंख के पास दोबारा उभर आया। मरीज ने एक बार फिर लापरवाही बरती और उसके बढ़ने तक इंतजार किया। दूसरी बार जब यह ट्यूमर बढ़ गया तो हमारे पास आया। हमने करीच दो घंटे चले ऑपरेशन के बाद इस ट्यूमर को हटा दिया। साथ ही मरीज को सख्त हिदायत दी कि समय समय पर फॉलोअप के लिए जरूर आए।
मानी जाती है दुर्लभ बीमारी
वॉन रेकलिंगीसेन डिसीज का पता पैचांलाजिस्ट डॉ. बीन रेकलिंगीसेन ने लगाया था। आमतौर पर यह चीमारी जन्मजात होती है। जोन की संरचना में कोई बदलाव (म्यूटेशन) होने पर यह बीमारी होती है। यह एक दुर्लभ बीमारी मानी जाती है।
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