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Mahakumbh 2025: रथ पर सवार होकर शाही स्नान में पहुंची स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन पॉवेल, नहीं लगा पाई डुबकी, स्वामी कैलाशानंद गिरि ने बताई वजह

Mahakumbh 2025: रथ पर सवार होकर शाही स्नान में पहुंची स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन पॉवेल, नहीं लगा पाई डुबकी, स्वामी कैलाशानंद गिरि ने बताई वजह
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Mahakumbh 2025: नई दिल्ली: महाकुंभ में अमेरिका के अरबपति कारोबारी स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन पॉवेल भगवा वस्त्र पहन रथ पर सवार होकर शाही स्नान के लिए संगम तट पहुंचीं। इस दौरान वह निरंजनी अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद सरस्वती के साथ थीं। दुनियाभर की मीडिया उनके इस रूप को देख स्तब्ध रह गई। लॉरेन पॉवेल जॉब्स महाकुंभ में कल्पवास करने के लिए आई हैं।

Mahakumbh 2025: उनके गुरु, आचार्य स्वामी कैलाशानंद ने उन्हें 'कमला' नाम से नवाजा और वह पौष पूर्णिमा के दिन संगम में अपनी पहली डुबकी लगाकर कल्पवास की शुरुआत करेंगी। वह तीन दिन तक इस कठिन व्रत का पालन करेंगी और 15 जनवरी को लौट जाएंगी। लॉरेन पॉवेल महाकुंभ में सादगी से जीवन बिताते हुए सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करेंगी। वह कैलाशानंद के शिविर में ठहरकर शिव तत्व को जानने और भारतीय संस्कृति को समझने का प्रयास करेंगी। महाकुंभ के पहले दिन शाही स्नान के बाद, वह महायज्ञ की मुख्य यजमान भी बनेंगी। आचार्य स्वामी कैलाशानंद गिरि ने कहा, "लॉरेन हमारी शिष्या हैं और हम उन्हें बेटी जैसा स्नेह देते हैं।"

Apple के पूर्व CEO स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन पॉवेल जॉब्स भी महाकुंभ में उपस्थित हैं, लेकिन उन्हें कुछ एलर्जी हो गई है, जिसके कारण वह स्नान नहीं कर पाईं। इस बारे में जानकारी आध्यात्मिक गुरु स्वामी कैलाशानंद गिरि ने दी।

Mahakumbh 2025: स्वामी कैलाशानंद गिरि ने किया लॉरेन पॉवेल जॉब्स के बारे में खुलासा

स्वामी कैलाशानंद गिरि ने बताया कि "लॉरेन पॉवेल जॉब्स इस समय मेरे शिविर में ठहरी हुई हैं। उसे स्नान करना है, लेकिन उसके हाथ में हल्की सी एलर्जी हो गई है। वह बहुत सरल और सहज स्वभाव की हैं, और कभी इतनी भीड़ में नहीं रही हैं, इस कारण वह स्नान में नहीं आई। वह अकेले स्नान करेंगी और इसके लिए मैंने उसका इंतजाम भी करवा दिया है।" स्वामी जी ने आगे कहा, "मेरा यह भाव है कि वह हमारे साथ पूजा-अर्चना, रात्रि पूजा, हवन, और अभिषेक में शामिल होगी। वह हमारे शिविर में विश्राम कर रही है। इस परंपरा का महत्व इसलिए विशेष है क्योंकि इससे वह लोग भी जुड़ रहे हैं जिन्होंने कभी हमारी संस्कृति को समझा नहीं था, लेकिन अब वे इस पारंपरिक जीवन पद्धति से जुड़े हैं।"


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