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"राज्य लगाए लगाम": सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों में सस्ती दवाइयां न मिलने पर लगाई फटकार, दिए ये सख्त निर्देश

"राज्य लगाए लगाम": सुप्रीम कोर्ट ने सस्ती दवाइयां न मिलने पर लगाई फटकार, दिए ये सख्त निर्देश

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सभी राज्य सरकारों को निजी अस्पतालों में दवाइयों, चिकित्सा उपकरणों और अन्य आवश्यक चिकित्सा सामग्रियों की अत्यधिक कीमतों पर नियंत्रण के लिए नीति बनाने का निर्देश दिया। यह फैसला एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें मरीजों को अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसियों से महंगे दामों पर सामान खरीदने के लिए मजबूर करने की प्रथा पर सवाल उठाया गया था।


न्यायमूर्ति सूर्यकांत और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने आदेश में कहा, "हम इस याचिका को इस निर्देश के साथ निस्तारित करते हैं कि सभी राज्य सरकारें इस मुद्दे पर विचार करें और उपयुक्त नीति निर्णय लें, जैसा वे उचित समझें।" लाइव लॉ के अनुसार, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मरीजों को ऐसी स्थिति में नहीं डाला जाना चाहिए, जहां उनके पास अस्पताल की फार्मेसी से महंगी दवाइयाँ और उपकरण खरीदने के अलावा कोई विकल्प न हो, जबकि बाजार में इनकी कीमतें निर्धारित हैं।


मरीजों का शोषण और ब्लैकमेल का आरोप

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने चिंता जताई कि निजी अस्पतालों में मरीजों को अक्सर अपनी फार्मेसियों से दवाइयाँ, इम्प्लांट और अन्य चिकित्सा सामग्री खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जो बाजार मूल्य से कहीं अधिक होती हैं। याचिकाकर्ताओं ने इसे "ब्लैकमेल" की संज्ञा देते हुए कहा कि यह प्रथा मरीजों को उचित मूल्य निर्धारण के उनके अधिकार से वंचित करती है।


2018 में दायर इस PIL में याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि निजी अस्पतालों को यह निर्देश दिया जाए कि वे मरीजों को केवल अपनी फार्मेसियों से सामान खरीदने के लिए मजबूर न करें। याचिकाकर्ताओं ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों का हवाला देते हुए बताया कि इलाज के दौरान उन्हें यह महसूस हुआ कि अस्पतालों में एक संगठित तंत्र काम करता है, जो मरीजों को शोषण का शिकार बनाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि ये फार्मेसियाँ दवाइयाँ और उपकरण अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से कई गुना अधिक कीमत पर बेचती हैं।


कोर्ट की टिप्पणी: निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में नियमन की कमी

सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात को स्वीकार किया कि निजी स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में नियमन असंगत है, जिसके कारण मरीजों के शोषण की संभावना बढ़ जाती है। कोर्ट ने कहा, "इस देश की जनसंख्या के अनुपात में राज्य सरकारें सभी मरीजों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त चिकित्सा बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं करा पाई हैं। इसलिए, निजी संस्थाओं को इस क्षेत्र में कदम रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप देश भर में कई बड़े अस्पताल स्थापित हुए।


राज्य और लोग इन पर बहुत हद तक निर्भर हैं।" हालांकि, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ऐसी प्रथाओं को नियंत्रित करने और लागू करने में कई चुनौतियाँ हैं। इसीलिए, सीधे आदेश देने के बजाय, अदालत ने राज्य सरकारों को इस मुद्दे का आकलन करने और मरीजों के अधिकारों की रक्षा करते हुए निजी अस्पतालों को संतुलित ढंग से काम करने की अनुमति देने वाली नीतियाँ बनाने का निर्देश दिया।


केंद्र और राज्यों का पक्ष

केंद्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों ने कोर्ट को बताया कि राष्ट्रीय क्लिनिकल संस्थान ने न्यूनतम मानक जारी किए हैं और अमृत तथा जन औषधि जैसे तंत्र सरकारी अस्पतालों में सस्ती दवाइयाँ उपलब्ध कराते हैं। केंद्र ने यह भी कहा कि मरीजों को अस्पतालों या उनकी फार्मेसियों से दवाइयाँ और सामग्री खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। वहीं, कई राज्यों ने अपनी योजनाओं का उल्लेख किया, जो सस्ती दरों पर दवाइयाँ और चिकित्सा सेवाएँ सुनिश्चित करती हैं।


स्वास्थ्य पर जेब से खर्च अभी भी चिंता का विषय

आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य देखभाल पर जेब से खर्च (OOPE) 2021-22 में 39.4 प्रतिशत था, जो 2013-14 के 64 प्रतिशत से कम है। फिर भी, यह उस 35 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर है, जिसे चार साल पहले सर्वेक्षण में सुझाया गया था। यह आंकड़ा दर्शाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की लागत अभी भी आम लोगों के लिए बोझ बनी हुई है, खासकर निजी अस्पतालों में।

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