AMU का अल्पसंख्यक दर्जा: सुप्रीम कोर्ट ने 1967 का फैसला किया खारिज, तीन जजों की नई बेंच करेगी पुनर्निर्धारण
नई दिल्ली। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम फैसला सुनाते हुए 1967 के फैसले को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने इस मामले में तीन जजों की एक नई बेंच गठित करने का निर्देश दिया है, जो विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे को नए सिरे से तय करेगी। कोर्ट ने 4-3 के बहुमत से यह निर्णय दिया, जिसमें चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा एकमत थे, जबकि जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने असहमति जताई।
चीफ जस्टिस ने फैसले में कहा कि अनुच्छेद 30ए के तहत अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त करने के मानदंड क्या हैं, यह बेंच नए सिरे से निर्धारित करेगी। साथ ही, अनुच्छेद 19(6) के तहत शैक्षणिक संस्थानों के विनियमन की अनुमति दी गई है, जब तक कि यह उनके अल्पसंख्यक चरित्र का उल्लंघन न करे। धार्मिक समुदाय अपने संस्थान स्थापित कर सकते हैं, लेकिन उनका प्रशासनिक नियंत्रण नहीं रख सकते। इसके अलावा, विशेष कानून के तहत स्थापित संस्थानों को अनुच्छेद 31 के तहत परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
AMU का इतिहास और विवाद:
AMU की स्थापना 1875 में सर सैयद अहमद खान ने 'अलीगढ़ मुस्लिम कॉलेज' के रूप में की थी, जिसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय के शैक्षिक विकास के लिए एक केंद्र स्थापित करना था। 1920 में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा मिला और नाम बदलकर 'अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय' कर दिया गया। एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर विवाद 1967 में शुरू हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय मानते हुए अल्पसंख्यक दर्जा न देने का फैसला सुनाया।
1981 में संसद ने संशोधन कर एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया, लेकिन 2005 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया। 2006 में केंद्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 2019 में तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने मामले को सात जजों की बेंच के पास भेजा था, जिस पर अब नया फैसला आया है।

