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जिला, जनपद, नपा और नगर परिषदों के अध्यक्ष सीधे चुन सकेगी जनता, प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव पर विचार

जनपद

भोपाल। प्रदेश सरकार अब जिला पंचायत और जनपद पंचायतों के अध्यक्ष के चुनाव सीधे जनता के माध्यम से कराने पर विचार कर रही है। वहीं नगरपालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के चुनाव भी फिर से डायरेक्ट कराने पर मंथन हो रहा है। यह मंथन संगठन से आए सुझाव के बाद किया जा रहा है। भाजपा के अधिकांश नेता इसकी वकालत कर रहे हैं और संगठन की बैठक में यह मुद्दा कई बार उठ चुका है। इस व्यवस्था को लागू करने सरकार को पंचायती राज अधिनियम में संशोधन करना होगा। पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद से ही इसके चुनाव को दलीय प्रणाली से दूर रखा गया था।

मंशा यह थी कि गांव के चुनाव मे दलीय राजनीति हावी न हो पर ऐसा नहीं हो सका। ग्राम से लेकर जिला पंचायत के चुनाव गैरदलीय आधार पर होते हैं पर सियासी दलों की अप्रत्यक्ष रूप से इनमें पूरी घुसपैठ होती है। सदस्य से लेकर अध्यक्ष बनाने तक में सियासी दलों के नेता पूरी तरह सक्रिय रहते हैं। जिला और जनपद पंचायत के चुनाव में सदस्य सीधे जनता से चुने जाते हैं और इसके बाद वह अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। हर जिला पंचायत और जनपद पंचायत में दस से लेकर पंद्रह वार्ड होते हैं। इनमें जीतने वाले सदस्य जिला पंचायत की तस्वीर तय करते हैं।

सीधे चुनाव न होने से अध्यक्ष पद के निर्वाचन के लिए जमकर खींचतान होती है और सदस्यों की खरीद फरोख्त के आरोप भी लगते हैं। पिछली बार के चुनाव में भोपाल, दमोह, खंडवा में ऐसे नजारे देखने को मिले थे जहां कम सदस्य संख्या होने के बाद भी चुनाव परिणाम चौंकाने वाले रहे थे। भोपाल में तीन सदस्य होने के बाद भी भाजपा ने अपना समर्थित अध्यक्ष बना लिया था तो दमोह में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी। हालांकि वे बाद में भाजपा में शामिल हो गईं थीं। इसी तरह खंडवा में कम सदस्य संख्या होने पर भी भाजपा ने बाजी पलट दी थी।

इसलिए अब इन जिला और जनपद पंचायतों के चुनाव सीधे जनता से कराने पर विचार हो रहा है। भाजपा समर्थित जिला और जनपद अध्यक्षों की बैठक में अधिकांश नेताओं ने यह सुझाव दिया था। लिहाजा संगठन ने सरकार से इस पर विचार करने का आग्रह किया है। इसके साथ ही नगरपालिका और नगर परिषदों के अध्यक्षों का निर्वाचन भी सीधे जनता से कराने पर विचार हो रहा है। अभी सिर्फ नगर निगम के मेयर ही सीधे मतदान से चुने जाते हैं।


कांग्रेस सरकार ने पलटा था फैसला
पहले नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद के अध्यक्षों का चुनाव सीधे जनता करती थी पर 2019 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद कमलनाथ सरकार ने इसे पलट दिया था और नगरीय निकायों के चुनाव प्रत्यक्ष की बजाए अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराने का तय किया था। हालांकि चुनाव होने से पहले ही कमलनाथ सरकार गिर गई और फिर से मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान ने इसे बदल दिया। पर भाजपा संगठन की सलाह पर इसे सिर्फ नगर निगमों तक ही सीमित रखा गया।

मेयर के चुनाव तो सीधे कराए गए पर नगरपालिका और नगर परिषदों में पार्षदों के अध्यक्ष चुनने की व्यवस्था की गई। अप्रत्यक्ष चुनाव होने से गई नगरपालिकाओं और नगरपरिषदों में पार्षद संख्या कम होने के बाद भी भाजपा अपने अध्यक्ष बनवाने में सफल रही थी। अब सरकार अगले विधानसभा सत्र में पंचायती राज अधिनियम और नगरीय निकाय चुनाव अधिनियम में संशोधन के लिए विधेयक ला सकती है।

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