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राज्यसभा के लिए खाली एमपी की एक सीट के लिए नामों पर मंथन शुरू, 3 सितंबर को होगा मतदान

राज्यसभा

उन्होंने कांग्रेस के सिंधिया को पटकनी दी थी। बाद में सिंधिया भाजपा में आए। भाजपा ने केपी का टिकट काटकर सिंधिया को दिया।

भोपाल। मध्यप्रदेश में राज्यसभा की एक सीट पर उपचुनाव की अधिसूचना जारी हो गई। राज्यसभा के लिए केपी यादव का नाम फिर सुर्खियों में है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को इस सीट से भाजपा ने राज्यसभा में भेजा था। जिन्हें बीता लोकसभा चुनाव गुना से लड़ाया गया। अब सिंधिया केंद्रीय मंत्री हैं। खाली राज्यसभा सीट पर पर तीन सितंबर को चुनाव होने हैं। चर्चा है कि भाजपा केपी यादव का नाम प्रस्तावित कर अपना वादा पूरा कर सकती है। लोकसभा चुनाव 2019 में केपी यादव गुना से सांसद चुने गए थे।

उन्होंने कांग्रेस के सिंधिया को पटकनी दी थी। बाद में सिंधिया भाजपा में आए। भाजपा ने केपी का टिकट काटकर सिंधिया को दिया। तब से चर्चाओं को बल मिला कि केपी नाराज हैं। दरअसल लोकसभा चुनाव 2024 में प्रचार पर आए केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने मंच से केपी को लेकर जनता को भरोसा दिया था कि क्षेत्र को एक नहीं आने वाले समय में दो सांसद मिलेंगे। यह भी कहा था कि केपी को बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। तब से कयास लगाए जा रहे हैं कि केपी को पार्टी राज्यसभा भेज सकती है।


एक सीट के लिए यह नाम भी चर्चा में
राज्यसभा की एक सीट के लिए 3 सितंबर को मतदान होना है। अधिसूचना जारी होने के साथ ही नाम पर मंथन शुरू हो गया है। जिसमें केपी यादव के साथ ही जयभान सिंह पवैया का नाम चल रहा हैं। पवैया महाराष्ट्र में सह प्रभारी हैं। वहां सक्रिय हैं। भाजपा को यहां मजबूत चेहरे की जरूरत है। ऐसे में पवैया का कद बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा दतिया से चुनाव हारे एवं भाजपा की न्यू ज्वाइनिंग टोली के संयोजक डॉ. नरोत्तम मिश्रा उपेक्षित बताए जा रहे हैं। जातिगत आधार पर सामान्य कोटे से सक्षम चेहरा हैं। 

लोक चुनाव के समय कांग्रेस से दिग्गजों को तोड़ने में उनकी बड़ी भूमिका रही। लाल सिंह आर्य व गोपाल भार्गव जैसे पुराने चेहरे नाराज बताए जाते हैं, इन्हें राज्यसभा भेजने की संभावनाएं कम है। यदि बड़े नामों पर सहमति नहीं बनी तो विकल्प के तौर पर इनमें से कोई एक नाम बढ़ाया जा सकता है। इन सबसे अलग संघ पृष्ठभूमि से जुड़े किसी जमीनी पदाधिकारी का नाम बढ़ाकर भी पार्टी चौंका सकती है। यह तब हो सकता है जब केपी केनाम पर सहमति न बने। प्रदेश से बाहर उस नेता का नाम हो सकता है, जो केंद्र में मंत्री तो है लेकिन लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य नहीं है।

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