SC: 'हिंदू धर्म जीवन शैली है', सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आस्था साबित करने के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं
SC: नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिंदू धर्म की प्रकृति और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पाठ, मंदिर जाने या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या विशेष कर्मकांड करना अनिवार्य नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी या घर में दीपक जलाकर आस्था व्यक्त करता है, तो वही उसके धर्म और विश्वास को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की। पीठ सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय की धार्मिक प्रथाओं और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। संविधान पीठ में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान उठी हिंदू धर्म की परिभाषा पर बहस
सुनवाई के 15वें दिन वरिष्ठ अधिवक्ता प्रोफेसर जी मोहन गोपाल ने अदालत के समक्ष कहा कि हिंदू धर्म को लेकर पहले कई न्यायिक व्याख्याएं दी गई हैं। उन्होंने कहा कि 1966 के एक फैसले में हिंदू को वह व्यक्ति बताया गया था, जो वेदों को धर्म और दर्शन का सर्वोच्च स्रोत मानता है। हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज हर हिंदू वास्तव में वेदों को सर्वोच्च मानता है।
इस पर न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा कि यही कारण है कि हिंदू धर्म को “जीवन जीने का तरीका” कहा जाता है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए मंदिर जाना या धार्मिक अनुष्ठान करना जरूरी नहीं है। व्यक्ति बिना किसी कर्मकांड के भी हिंदू रह सकता है।
“झोपड़ी में जलाया दीपक भी आस्था का प्रतीक”
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा, “लोग अपनी झोपड़ी में दीपक जलाते हैं, बस इतना ही काफी है।” अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की आस्था और धर्म को केवल बाहरी धार्मिक प्रथाओं से नहीं आंका जा सकता। व्यक्ति अपने तरीके से धर्म का पालन कर सकता है और संविधान का अनुच्छेद 25 उसे धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
धार्मिक स्वतंत्रता और समानता पर चर्चा
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करने के लिए नहीं किया जा सकता। प्रोफेसर गोपाल ने अमेरिकी न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग दूसरों की नागरिक स्वतंत्रता छीनने के लिए नहीं कर सकता।
सबरीमला मामले का भी हुआ जिक्र
गौरतलब है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को 4:1 के बहुमत से हटाया था। अदालत ने उस प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद देशभर में धार्मिक परंपराओं, महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर व्यापक बहस शुरू हुई थी। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियों को धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आस्था के अधिकार के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

