Hareli Tihar : छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार हरेली : गाय-बैलों की पूजा, गेड़ी, पारंपरिक पकवान और रहचुली झूला बिन अधूरा है ये पर्व

सावन के मौसम में मनाया जाने वाला यह पर्व प्रदेश की लोक संस्कृति, खेती-किसानी और प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

Update: 2026-08-11 11:35 GMT

रायपुर। छत्तीसगढ़ में हरेली तिहार पूरे उत्साह और पारंपरिक रंगों के साथ मनाया जा रहा है। सावन के मौसम में मनाया जाने वाला यह पर्व प्रदेश की लोक संस्कृति, खेती-किसानी और प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। समय के साथ मनोरंजन और जीवनशैली के तौर-तरीके भले बदल गए हों, लेकिन हरेली की परंपराएं आज भी लोगों को अपनी जड़ों और गांव की पुरानी यादों से जोड़ती हैं। यही वजह है कि हरेली के मौके पर गेड़ी, रहचुली झूला और पारंपरिक खेलों का उत्साह आज भी देखने को मिलता है।

खेती-किसानी और पशुधन की पूजा का पर्व

हरेली तिहार को किसानों का प्रमुख पर्व माना जाता है। इस दिन किसान अपने कृषि उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी विधिवत पूजा करते हैं। हल, कुदाली, फावड़ा, गैंती, टंगिया और दूसरे खेती-किसानी में इस्तेमाल होने वाले औजारों को धोकर पूजा के लिए तैयार किया जाता है। इसके साथ ही गाय, बैल और अन्य पशुधन को नहलाकर उनकी पूजा की जाती है। कई जगह बैलों और बैलगाड़ियों को सजाने की भी परंपरा है। इस तरह हरेली पर्व खेती में सहयोग देने वाले पशुधन और कृषि उपकरणों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर बनता है।




 गेड़ी के बिना अधूरा है हरेली का उत्सव

हरेली और गेड़ी का रिश्ता बेहद पुराना है। गांवों में त्योहार से कई दिन पहले ही बांस की गेड़ी तैयार होने लगती है। बच्चे और युवा गेड़ी पर चढ़कर गांव की गलियों में घूमते हैं और इसकी प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेते हैं। पहले बारिश के दिनों में कच्ची ग्रामीण सड़कें कीचड़ से भर जाती थीं। ऐसे समय में गेड़ी पर चलना मनोरंजन के साथ-साथ कीचड़ से बचने का एक उपयोगी तरीका भी माना जाता था। आज गांवों में पक्की सड़कें बन गई हैं, लेकिन गेड़ी की परंपरा अब भी हरेली की पहचान बनी हुई है।

गेड़ी पर चलते समय बांस और लकड़ी से निकलने वाली ‘रच-रच’ की आवाज भी इस पर्व के माहौल को खास बना देती है। बच्चों के साथ युवा भी गेड़ी दौड़, कबड्डी, खो-खो, फुगड़ी और दूसरे पारंपरिक खेलों में उत्साह से शामिल होते हैं।




 रहचुली झूले की भी खास पहचान

हरेली के मौके पर रहचुली झूले का भी अपना अलग आकर्षण है। आधुनिक झूलों के दौर में भी ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रहचुली झूले की याद लोगों को अपनी पुरानी संस्कृति से जोड़ती है। सावन की फुहारों के बीच झूले का आनंद लेना हरेली के उत्सव को और खास बना देता है। यह परंपरा आज भी कई इलाकों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।




 लोक खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम

हरेली सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। इस दिन गांवों और शहरों में कई तरह के पारंपरिक खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पिट्ठूल, भौरा, कबड्डी, गेड़ी दौड़ और अन्य खेल बच्चों और युवाओं के बीच खास आकर्षण का केंद्र रहते हैं। 

घरों में बनते हैं छत्तीसगढ़ी पारंपरिक पकवान

हरेली के मौके पर घरों में भी खास तैयारियां होती हैं। महिलाएं पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन तैयार करती हैं। गुड़हा चीला, ठेठरी, खुरमी, चीला, फरा, मुठिया, धुसका, चांउर रोटी, अंगाकर, बफौरी और चउँसेला जैसे पकवान इस पर्व की मिठास बढ़ाते हैं। परिवार के सभी सदस्य मिलकर इन व्यंजनों का आनंद लेते हैं और त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।




प्रकृति के प्रति आभार जताने का संदेश

हरेली का अर्थ ही हरियाली से जुड़ा है। बारिश के मौसम में जब खेत और आसपास का वातावरण हरियाली से भर जाता है, तब यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार जताने का अवसर भी बनता है। खरीफ की खेती से जुड़ी शुरुआती तैयारियों के बाद किसान धरती, पशुधन और कृषि उपकरणों के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में हरेली को स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।

हरेली तिहार इस बात की मिसाल है कि आधुनिकता के बीच भी लोक परंपराएं अपनी पहचान बनाए रख सकती हैं। गेड़ी की रच-रच की आवाज, रहचुली झूले की मस्ती, पारंपरिक खेल, छत्तीसगढ़ी पकवान और खेती-किसानी से जुड़ी पूजा इस पर्व को प्रदेश की संस्कृति का खास हिस्सा बनाती हैं।

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