Former IAS Babulal Agrawal Case: 16 साल बाद खुली पूर्व IAS बाबूलाल अग्रवाल की बंद फाइल, 472 ग्रामीणों के खातों से करोड़ों के लेन-देन की जांच शुरु, जानें पूरा मामला
Former IAS Babulal Agrawal Case: पूर्व IAS बीएल अग्रवाल से जुड़े 16 साल पुराने केस की EOW-ACB ने दोबारा जांच शुरू की है। खरोरा के 472 ग्रामीणों के बैंक खातों और करोड़ों के शेयर लेन-देन की पड़ताल हो रही है।
रायपुर। छत्तीसगढ़ के पूर्व आईएएस बीएल अग्रवाल से जुड़े करीब 16 साल पुराने मामले में जांच फिर शुरू हो गई है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) और एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की नई टीम अब खरोरा क्षेत्र के उन 472 ग्रामीणों से पूछताछ कर रही है, जिनके नाम पर बैंक खाते खोले गए थे। जांच में इन खातों के जरिए करोड़ों रुपये के लेन-देन और शेयर खरीदने की प्रक्रिया की पड़ताल की जा रही है।
मामले में सबसे अहम बात यह है कि इन ग्रामीणों में से कई को कथित तौर पर यह जानकारी ही नहीं थी कि उनके नाम पर बैंक खातों में रकम आने के बाद उससे किसी कंपनी के शेयर खरीदे गए। जांच एजेंसी अब ग्रामीणों के बयान और बैंक खातों के रिकॉर्ड को जोड़कर पूरे लेन-देन की कड़ियां तलाश रही है।
472 ग्रामीणों के खातों तक पहुंची जांच
जांच के दौरान सामने आए रिकॉर्ड के मुताबिक, खरोरा इलाके के ग्रामीणों के नाम पर बैंक खाते खोले गए थे। इन खातों में रकम ट्रांसफर की गई और बाद में उसी रकम से एक कंपनी के शेयर खरीदे गए। शेयर ग्रामीणों के नाम पर अलॉट किए जाने की बात भी जांच के दायरे में है।
अब जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इन खातों में रकम किसने जमा कराई, शेयर खरीदने का फैसला किस स्तर पर हुआ और इन पूरी गतिविधियों के पीछे वास्तविक लाभार्थी कौन थे।
ग्रामीणों के बयान इस जांच में अहम माने जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि कई ग्रामीण बुजुर्ग हैं और उन्हें अपने नाम पर हुए इन वित्तीय लेन-देन की जानकारी तक नहीं थी।
कंपनी के दिवालिया होने के बाद शेयरों की कीमत हुई खत्म
मामले में जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू संबंधित कंपनी का बाद में दिवालिया होना बताया जा रहा है। आरोपों के मुताबिक, ग्रामीणों के नाम पर खरीदे गए शेयरों वाली कंपनी के दिवालिया होने के बाद इन शेयरों का मूल्य लगभग खत्म हो गया।
इसके बाद कंपनी की संपत्तियों और शेयरों के दूसरी कंपनी के पास जाने की प्रक्रिया की भी जांच की जा रही है। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस दूसरी कंपनी का पूर्व आईएएस से जुड़े कारोबारी हितों से क्या संबंध है।
हालांकि, इस पूरे लेन-देन में किसकी क्या भूमिका थी और किसी आपराधिक साजिश या मनी लॉन्ड्रिंग का हिस्सा था या नहीं, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
2010 में आयकर छापे से शुरू हुआ था मामला
बीएल अग्रवाल के खिलाफ यह मामला वर्ष 2010 में आयकर विभाग की कार्रवाई के बाद सामने आया था। आयकर विभाग की छापेमारी के बाद उनके घर और उनसे जुड़े अन्य ठिकानों पर जांच हुई थी। इसी दौरान खरोरा क्षेत्र के एक गांव के 472 ग्रामीणों से जुड़े बैंक खातों की जानकारी सामने आने की बात कही गई थी।
इसके बाद EOW-ACB ने आय से अधिक संपत्ति समेत भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की जांच शुरू की। कई वर्षों तक जांच चलने के बाद वर्ष 2017 में एजेंसी ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी।
उस समय एजेंसी की ओर से यह तर्क दिया गया था कि ग्रामीणों के खातों में मौजूद रकम का सीधा संबंध पूर्व आईएएस से साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य नहीं मिले।
ED की कार्रवाई के बाद फिर बदला घटनाक्रम
EOW की क्लोजर रिपोर्ट के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मामले में कार्रवाई की। ED ने पूर्व आईएएस से जुड़ी करीब 27.86 करोड़ रुपये की संपत्तियां अटैच की थीं।
इसके बाद EOW ने अदालत में अपनी पहले दाखिल क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने के लिए आवेदन किया। हालांकि, इसके बाद जांच लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी और मामला फाइलों में पड़ा रहा।
अब नई टीम ने पुराने रिकॉर्ड को फिर से खंगालना शुरू किया है।
बुजुर्ग ग्रामीणों के लिए जा रहे बयान
वर्तमान जांच में सबसे ज्यादा ध्यान उन 472 ग्रामीणों पर है, जिनके नाम से बैंक खाते खोले गए थे। एजेंसी इन ग्रामीणों को बुलाकर उनके बयान दर्ज कर रही है और बैंक खातों से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है।
बताया जा रहा है कि इनमें बड़ी संख्या में ग्रामीण अब 70 से 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। कुछ ग्रामीणों की मौत भी हो चुकी है। ऐसे में जांच टीम उपलब्ध दस्तावेजों और संबंधित लोगों के बयानों के आधार पर पुराने लेन-देन की कड़ियां जोड़ रही है।
अब सामने आएगा करोड़ों के लेन-देन का सच
करीब डेढ़ दशक से ज्यादा समय पुराने इस मामले की दोबारा जांच के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 472 ग्रामीणों के बैंक खातों का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया और इन खातों से होकर गुजरने वाली रकम का वास्तविक लाभार्थी कौन था।
जांच एजेंसी शेयर खरीद, कंपनी के दिवालिया होने और बाद में संपत्तियों के दूसरी कंपनी में जाने के पूरे क्रम की पड़ताल कर रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस पूरे नेटवर्क में किन लोगों की भूमिका थी और वित्तीय लेन-देन के पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या था।