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Good Maharaja: कौन थे गुजरात के ‘गुड महाराजा’? जिनकी दरियादिली को आज भी याद करता है पोलैंड, PM मोदी ने ने पोल‍िश पीएम डोनाल्ड टस्क से क‍िया जिक्र

Good Maharaja: जानिए गुजरात के जामनगर के महाराजा दिग्विजयसिंहजी की कहानी, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के बच्चों को शरण दी थी। PM नरेंद्र मोदी ने पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क से मुलाकात के दौरान ‘गुड महाराजा’ का जिक्र किया।

Good Maharaja: कौन थे गुजरात के ‘गुड महाराजा’? जिनकी दरियादिली को आज भी याद करता है पोलैंड, PM मोदी ने ने पोल‍िश पीएम डोनाल्ड टस्क से क‍िया जिक्र
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Good Maharaja Digvijaysinhji Jadeja: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की मुलाकात के दौरान ‘गुड महाराजा’ का जिक्र एक बार फिर चर्चा में आ गया है। गुजरात की रियासत नवानगर, जो आज जामनगर के नाम से जानी जाती है, के महाराजा दिग्विजयसिंहजी रणजीतसिंहजी जडेजा ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के सैकड़ों बच्चों को शरण देकर मानवता की मिसाल पेश की थी। उनके इस असाधारण योगदान को आज भी पोलैंड में सम्मान के साथ याद किया जाता है। इसी ऐतिहासिक कहानी पर ‘द गुड महाराजा’ नाम से फिल्म भी बनाई जा रही है, जिसमें अभिनेता संजय दत्त मुख्य भूमिका में नजर आएंगे।

कौन थे गुजरात के ‘गुड महाराजा’?

महाराजा दिग्विजयसिंहजी रणजीतसिंहजी जडेजा का जन्म 18 सितंबर 1895 को गुजरात के सरोदर में हुआ था। वर्ष 1933 में उन्होंने अपने चाचा महाराजा रणजीतसिंहजी के उत्तराधिकारी के रूप में नवानगर रियासत की जिम्मेदारी संभाली। वे 1948 तक यहां के शासक रहे। उन्होंने भारत और इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त की और ब्रिटिश सेना में भी सेवाएं दीं। सैन्य सेवा के दौरान वे लेफ्टिनेंट जनरल के पद तक पहुंचे।

हालांकि, उनकी पहचान केवल एक शासक या सैन्य अधिकारी तक सीमित नहीं रही। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के बच्चों की मदद के लिए उठाए गए उनके कदमों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवीय संवेदना और उदारता का प्रतीक बना दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध में पोलैंड के बच्चों की मदद

1939 में जर्मनी और सोवियत संघ के हमलों के बाद पोलैंड के हालात बेहद खराब हो गए थे। बड़ी संख्या में पोलिश नागरिक बेघर हो गए और कई बच्चे युद्ध की विभीषिका से प्रभावित हुए। कुछ बच्चों को सोवियत श्रम शिविरों से बाहर निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी।

ऐसे कठिन दौर में महाराजा दिग्विजयसिंहजी ने मदद का हाथ बढ़ाया। वर्ष 1942 में उन्होंने गुजरात के बालाचड़ी में पोलिश बच्चों के लिए एक शरणस्थल स्थापित कराया। यहां लगभग 600 से 1,000 बच्चों को रहने, भोजन और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया गया। युद्ध और विस्थापन से जूझ रहे इन बच्चों को इस शिविर में देखभाल और सामान्य जीवन की ओर लौटने का अवसर मिला।

कैसे पड़ा ‘गुड महाराजा’ नाम?

पोलिश बच्चों के प्रति महाराजा के स्नेह और सहयोग ने उनके दिलों में विशेष स्थान बना दिया। पोलैंड में उन्हें ‘डोब्री महाराजा’ कहा जाने लगा, जिसका अर्थ है ‘गुड महाराजा’। यह नाम उनके मानवीय व्यवहार और संकट के समय जरूरतमंदों की मदद करने की भावना का प्रतीक बन गया।

महाराजा ने जिन बच्चों को सुरक्षा और अपनापन दिया, उनके लिए बालाचड़ी का शरणस्थल युद्ध के कठिन दौर में आशा की किरण साबित हुआ। इसी वजह से उनकी कहानी पीढ़ियों तक याद रखी गई और भारत-पोलैंड संबंधों में मानवीय जुड़ाव का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।

पोलैंड में आज भी सम्मान के साथ याद किए जाते हैं महाराजा

महाराजा दिग्विजयसिंहजी के योगदान को पोलैंड में लंबे समय से सम्मान मिलता रहा है। उन्हें मरणोपरांत पोलैंड के ‘कमांडर्स क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मेरिट’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 1989 में पोलैंड की राजधानी वारसॉ में उनके सम्मान में ‘गुड महाराजा स्क्वायर’ भी बनाया गया।

ये सम्मान बताते हैं कि दशकों पहले भारत में एक रियासत के शासक द्वारा की गई मदद को पोलैंड आज भी कृतज्ञता के साथ याद करता है। महाराजा की कहानी दोनों देशों के बीच केवल कूटनीतिक संबंधों की नहीं, बल्कि साझा मानवीय मूल्यों और ऐतिहासिक दोस्ती की भी मिसाल है।

‘द गुड महाराजा’ फिल्म से फिर चर्चा में आएंगे महाराजा

महाराजा दिग्विजयसिंहजी की कहानी अब सिनेमा के माध्यम से भी व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने की तैयारी है। ‘द गुड महाराजा’ नाम से बन रही फिल्म में संजय दत्त मुख्य भूमिका निभाएंगे। फिल्म के जरिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलिश बच्चों को दी गई शरण और महाराजा के मानवीय योगदान को सामने लाने की कोशिश की जा रही है।

इस कहानी की खासियत यह है कि इसमें युद्ध और राजनीति के बीच मानवता, करुणा और सहयोग को केंद्र में रखा गया है। यह उस ऐतिहासिक अध्याय को याद करने का अवसर भी है, जब भारत से मिले सहारे ने संकट में फंसे सैकड़ों बच्चों को सुरक्षित भविष्य की उम्मीद दी थी।

16 साल बाद भारत आए पोलैंड के प्रधानमंत्री

पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क 22 अक्टूबर को तीन दिवसीय भारत दौरे पर दिल्ली पहुंचे। हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात में दोनों देशों के राजनीतिक और आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई। इस दौरे में पोलैंड की करीब 100 कंपनियों का कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी शामिल है।

दिल्ली के बाद डोनाल्ड टस्क के बेंगलुरु जाने और वहां तकनीक तथा अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात करने का कार्यक्रम है। भारत और पोलैंड के बीच रक्षा विनिर्माण, व्यापार, उभरती तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की संभावना है। रूस-यूक्रेन युद्ध, क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत-यूरोपीय संघ संबंध भी बातचीत के प्रमुख विषय हो सकते हैं।

इतिहास से मजबूत होते भारत-पोलैंड के रिश्ते

पोलिश प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान ‘गुड महाराजा’ का जिक्र दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्तों के मानवीय पहलू को सामने लाता है। महाराजा दिग्विजयसिंहजी ने जिस समय पोलिश बच्चों को शरण दी, उस समय भारत और पोलैंड के बीच आज जैसे व्यापक कूटनीतिक और आर्थिक संबंध नहीं थे। इसके बावजूद उनकी मदद ने दोनों देशों के लोगों के बीच ऐसा रिश्ता बनाया, जिसे दशकों बाद भी याद किया जाता है।

आज भारत और पोलैंड व्यापार, तकनीक, रक्षा और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में ‘गुड महाराजा’ की कहानी इस बात की याद दिलाती है कि देशों के बीच स्थायी मित्रता केवल समझौतों से नहीं, बल्कि कठिन समय में दिखाई गई मानवता और भरोसे से भी बनती है।


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