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छत्तीसगढ़ का ऐसा गांव जहां पंचांग नहीं सिरदार देव की अनुमति से मनती है दिवाली, जानें ये अनोखी परंपरा

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सेमरा गांव में पंचांग के बजाय सिरदार देव की मान्यता के अनुसार दिवाली मनाई जाती है। यहां देशभर से सात दिन पहले दीपोत्सव होता है। जानिए इस अनोखी परंपरा के पीछे की मान्यता और खास आयोजन।

छत्तीसगढ़ का ऐसा गांव जहां पंचांग नहीं सिरदार देव की अनुमति से मनती है दिवाली, जानें ये अनोखी परंपरा
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कुरुद। देशभर में दीपावली का इंतजार अपने तय कैलेंडर और पंचांग के अनुसार होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक ऐसा गांव भी है, जहां त्योहारों की तारीखें परंपरा के मुताबिक तय होती हैं। भखारा तहसील के ग्राम सेमरा (सि) में हर साल देश के दूसरे हिस्सों से करीब सात दिन पहले दिवाली मनाई जाती है। गांव में यह अनूठी परंपरा वर्षों से चली आ रही है और ग्रामीण आज भी इसका पूरी श्रद्धा के साथ पालन करते हैं। यहां किसी भी पर्व की शुरुआत ग्राम देवता सिरदार देव की पूजा और अनुमति के बाद ही होती है।

सिरदार देव की मान्यता से जुड़ी है अनोखी परंपरा

करीब 1200 की आबादी वाले सेमरा गांव में त्योहारों को समय से पहले मनाने की परंपरा के पीछे सिरदार देव से जुड़ी मान्यता है। ग्रामीणों के अनुसार, सदियों पहले सिरदार नाम के एक संत और बुजुर्ग ने गांव में निवास किया था। मान्यता है कि उन्होंने ग्रामीणों को किसी बड़ी दैवीय विपदा और अनहोनी से बचाने के उद्देश्य से त्योहार पहले मनाने की परंपरा शुरू की थी। तभी से गांव में यह रिवाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।

दिवाली से लेकर होली तक सात दिन पहले मनते हैं त्योहार

सेमरा में सिर्फ दीपावली ही नहीं, बल्कि होली, हरेली और पोला जैसे पारंपरिक त्योहार भी आमतौर पर तय तारीख से करीब एक सप्ताह पहले मनाए जाते हैं। गांव में सबसे पहले सिरदार देव के थान में पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद ही पर्व की तैयारियां और आयोजन शुरू होते हैं। हालांकि, धनतेरस और नरक चतुर्दशी गांव में भी देश के बाकी हिस्सों के साथ ही मनाई जाती हैं।

3 नवंबर को दीपोत्सव, 4 नवंबर को गोवर्धन पूजा

इस बार भी सेमरा में दीपावली का उत्सव तय परंपरा के अनुसार मनाया जा रहा है। 3 नवंबर की रात गांव में महालक्ष्मी पूजन और गौरा जागरण का आयोजन होगा। वहीं, 4 नवंबर को गोवर्धन पूजा के साथ गांव में उत्सव का अगला चरण पूरा होगा। इन आयोजनों में मांदर की थाप और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की झलक देखने को मिलेगी।

लोकनृत्य मंडलियां जमाएंगी रंग

इस बार आयोजन में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी खास जगह दी गई है। 3 नवंबर की रात राजनांदगांव जिले के भकुरा से पहुंचने वाली चंपा बासन नाच पार्टी प्रस्तुति देगी। वहीं, 4 नवंबर की शाम कबीरधाम जिले के लखनपुर की मया के अंचरा नाच पार्टी लोकनृत्य और संगीत के जरिए दर्शकों का मनोरंजन करेगी। इन कार्यक्रमों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोककला और सांस्कृतिक विरासत को मंच मिलेगा।

40 गांवों के लोग बनते हैं इस परंपरा के साक्षी

सेमरा की इस अनोखी दिवाली को देखने के लिए धमतरी जिले के अलावा पड़ोसी बालोद जिले के ग्रामीण भी पहुंचते हैं। अनुमान है कि आसपास के करीब 40 गांवों के लोग इस उत्सव में शामिल होते हैं। इससे गांव में दीपावली के दौरान खास रौनक रहती है और पूरा क्षेत्र लोकपरंपरा के रंग में रंग जाता है।

नई पीढ़ी भी संभाल रही विरासत

गांव के सरपंच छबिलेश सिन्हा, पूर्व सरपंच सुधीर बल्लाल सहित कामता निषाद, उमेश देवांगन, गजेंद्र सिन्हा, चंद्रहास सिन्हा, पंडित ओमप्रकाश तिवारी, यशवंत शुक्ला और घनश्याम देवांगन का कहना है कि यह परंपरा गांव की पहचान और पूर्वजों की धरोहर है। ग्रामीण इसे सिरदार देव के प्रति अपनी आस्था और गांव की सुरक्षा से जुड़ी मान्यता के रूप में देखते हैं।


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