Bastar Tribal Culture: भंगाराम माई की अदालत में देवी-देवताओं की पेशी आज, जानें बस्तर की भादो जातरा की अनोखी परंपरा बारे में
Bastar Tribal Culture: केशकाल में भादो जातरा के दौरान भंगाराम माई के दरबार में देवी-देवताओं की ‘अदालत’ लगने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। जानें बस्तर की इस लोक आस्था के बारे में।

रायपुर/कोंडागांव। छत्तीसगढ़ के बस्तर की जनजातीय परंपराएं अपनी अलग पहचान रखती हैं। यहां आस्था से जुड़ी कई रस्में आज भी सदियों पुरानी मान्यताओं के साथ निभाई जाती हैं। ऐसी ही एक अनोखी परंपरा कोंडागांव जिले के केशकाल में भादो जातरा के दौरान देखने को मिलती है, जहां मान्यता के अनुसार देवी-देवताओं की बाकायदा ‘अदालत’ लगती है।
केशकाल के टाटामारी पर्यटन मार्ग पर स्थित भंगाराम माई के दरबार में क्षेत्र के नौ परगना से देवी-देवताओं के प्रतीक, पुजारी, सिरहा, गुनिया, मांझी और गायता पहुंचते हैं। यहां सालभर के दौरान सामने आई शिकायतों और समस्याओं को लेकर सुनवाई होने की मान्यता है। दोषी माने जाने वाले देवता को पारंपरिक रूप से दंड और बेहतर कार्य करने वाले देवता को सम्मान दिए जाने की परंपरा बताई जाती है।
कहां लगता है भंगाराम माई का दरबार?
भंगाराम माई का दरबार केशकाल घाटी के ऊपर टाटामारी पर्यटन मार्ग पर सजता है। केशकाल घाटी अपनी घुमावदार सड़क के लिए भी जानी जाती है।
भादो जातरा के अवसर पर आसपास के क्षेत्रों से देवी-देवताओं के प्रतीक, जिन्हें स्थानीय परंपरा में लाठ, आंगा और छत्र जैसे रूपों में माना जाता है, यहां लाए जाते हैं। उनके साथ संबंधित पुजारी और जनजातीय धार्मिक व्यवस्था से जुड़े लोग भी मौजूद रहते हैं।
कैसे लगती है देवी-देवताओं की ‘अदालत’?
स्थानीय मान्यता के अनुसार, अगर किसी गांव में सालभर के दौरान महामारी जैसी समस्या आई हो, फसल खराब हुई हो या ग्रामीण अपने देवी-देवता से किसी वजह से असंतुष्ट हों, तो इसकी शिकायत भंगाराम माई के दरबार में रखी जाती है।
इस परंपरा में भंगाराम माई को सर्वोच्च न्यायाधीश का दर्जा दिया जाता है। सुनवाई के बाद दोषी माने जाने वाले देवी-देवता को पारंपरिक तौर पर सजा दिए जाने की मान्यता है। वहीं अच्छे कार्य के लिए देवताओं को सम्मानित भी किया जाता है।
यही वजह है कि इस आयोजन को स्थानीय जनजातीय आस्था में केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जवाबदेही से जुड़ी एक विशेष परंपरा के तौर पर देखा जाता है।
पुलिस थाने में भी होती है हाजिरी
भादो जातरा से जुड़ी एक खास परंपरा यह भी बताई जाती है कि देवी-देवताओं के प्रतीकों को मुख्य दरबार में ले जाने से पहले केशकाल पुलिस थाने लाया जाता है।
यहां पुलिसकर्मी और अधिकारी इन प्रतीकों की पूजा करते हैं और उनकी हाजिरी दर्ज की जाती है। इसके बाद परंपरा के अनुसार उन्हें भंगाराम माई के दरबार की ओर ले जाया जाता है।
डॉक्टर पठान देवता की भी होती है पूजा
इस आयोजन से जुड़ी मान्यताओं में महाराष्ट्र से जुड़े ‘डॉक्टर पठान देवता’ का भी उल्लेख मिलता है। उन्हें प्रसन्न करने के लिए नींबू और अंडे अर्पित किए जाने की परंपरा बताई जाती है।
यह प्रसंग बस्तर क्षेत्र की लोक आस्था की उस विविधता को भी दिखाता है, जहां अलग-अलग स्थानीय मान्यताएं एक ही सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बनती दिखाई देती हैं।
भादो जातरा में महिलाओं का प्रवेश वर्जित
इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू यह है कि जातरा के दिन मुख्य दरबार में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति नहीं होती। यह व्यवस्था स्थानीय परंपरा और मान्यता के तहत बताई जाती है।
इसके अलावा, मान्यता के अनुसार भंगाराम माई की अनुमति के बिना क्षेत्र में किसी नए देवी-देवता की स्थापना या पूजा नहीं की जा सकती।
बस्तर की संस्कृति को समझने का अलग नजरिया
भंगाराम माई की भादो जातरा बस्तर की उस लोक-संस्कृति की झलक देती है, जिसमें देवी-देवताओं से जुड़ी मान्यताएं सामाजिक जीवन और गांव की सामूहिक व्यवस्था से भी जुड़ी हुई हैं।
देवी-देवताओं की ‘अदालत’, शिकायतों की सुनवाई और दंड की परंपरा जैसी मान्यताएं इसे दूसरे धार्मिक आयोजनों से अलग बनाती हैं। यही अनूठापन इस जातरा को लोगों के लिए जिज्ञासा और आकर्षण का विषय बनाता है।


