Raj Kundra Bitcoin Scam Case: बिटकॉइन घोटाला मामले में राज कुंद्रा को कोर्ट ने भेजा समन, ईडी ने चार्जशीट के आधार पर मांगा जवाब

By :  Dev Verma
Update: 2026-01-19 10:13 GMT

Raj Kundra Bitcoin Scam Case: मुंबई। मुंबई की विशेष पीएमएलए (PMLA) अदालत ने चर्चित Gain Bitcoin Ponzi Scam से जुड़े मामले में कारोबारी राज कुंद्रा को समन जारी किया है। अदालत ने यह कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दाखिल की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए की है। इसी मामले में दुबई स्थित कारोबारी राजेश सतीजा को भी अदालत ने पेश होने के निर्देश दिए हैं।

ईडी की जांच में क्या सामने आया?

ईडी ने सितंबर 2025 में पीएमएलए के तहत दर्ज मामले में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर राज कुंद्रा और राजेश सतीजा को आरोपी बनाया था। जांच एजेंसी के अनुसार, Gain Bitcoin Scam के मास्टरमाइंड रहे अमित भारद्वाज ने यूक्रेन में बिटकॉइन माइनिंग फार्म स्थापित करने के लिए राज कुंद्रा को 285 बिटकॉइन ट्रांसफर किए थे। हालांकि यह माइनिंग प्रोजेक्ट कभी पूरा नहीं हो पाया, लेकिन ईडी का दावा है कि ये 285 बिटकॉइन आज भी राज कुंद्रा के पास मौजूद हैं, जिनकी मौजूदा बाजार कीमत 150 करोड़ रुपये से अधिक आंकी जा रही है।

‘सिर्फ मध्यस्थ’ होने का दावा क्यों खारिज?

राज कुंद्रा ने जांच के दौरान खुद को इस सौदे में केवल मध्यस्थ बताया था, लेकिन ईडी का कहना है कि वे इस दावे के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सके। चार्जशीट के मुताबिक, ‘टर्म शीट’ नाम का समझौता राज कुंद्रा और महेंद्र भारद्वाज के बीच हुआ था, जिससे यह संकेत मिलता है कि वास्तविक लेनदेन सीधे तौर पर राज कुंद्रा और अमित भारद्वाज के बीच ही हुआ। ईडी का मानना है कि उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर कुंद्रा का मध्यस्थ होने का दावा अमान्य है।

बिटकॉइन की संख्या याद, लेकिन वॉलेट की जानकारी नहीं

जांच एजेंसी ने यह भी बताया कि लेनदेन को 7 साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद राज कुंद्रा को पांच अलग-अलग किस्तों में मिले बिटकॉइन की सटीक संख्या याद है। इससे ईडी को संदेह है कि वे इस क्रिप्टोकरेंसी के वास्तविक लाभार्थी हो सकते हैं। हालांकि 2018 से अब तक कई बार पूछे जाने के बावजूद कुंद्रा उन वॉलेट एड्रेस की जानकारी नहीं दे पाए, जिनमें बिटकॉइन ट्रांसफर किए गए थे। उन्होंने इसके लिए अपने iPhone X के खराब हो जाने की दलील दी। ईडी ने इस तर्क को जानबूझकर सबूत नष्ट करने और अपराध से अर्जित धन छिपाने की कोशिश करार दिया है।

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