नई दिल्ली/पुरी: देश के अधिकांश हिस्से में इस समय चक्रवात तूफान "अर्नब" का असर देखें को मिल रहा है। तेज आंधी और भारी बारिश के बीच भी आस्था और भक्तों का हौसला कम नहीं हो रहा, अब ओडिशा से जबरदस्त नजारा सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है।

यहां भारी बारिश और आंधी भी सदियों से चली आ रही परम्परा नहीं रोक पाई। खराब मौसम के बावजूद महाप्रभु भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर पर लगी पवित्र पताका बदली गई। इस नज़ारे को देखकर भक्त भी हैरान और अचंभित रह गए।

चक्रवाती तूफान के बीच निभाई गई परंपरा

ओड़िसा सहित देश भर में चक्रवाती तूफान अर्नब का असर देखने को मिल रहा है। अधिकांश हिस्सों में तेज आंधी के साथ भारी बारिश हो रही है। पुरी में भी मौसम काफी खराब है। तेज बारिश और आंधी के बीच भी भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर रोजाना बदलने वाले ध्वज की परंपरा निभाई गई। मंदिर के शिकार यानी करीब 214 फीट ऊंचे शिखर पर चढ़कर चुनरा सेवायत ने नीलचक्र पर लगे पताका को बदला।

45 मंजिला इमारत जितनी ऊंचाई पर चढ़ते हैं सेवक

श्री जगन्नाथ मंदिर की ऊंचाई करीब 214 फीट है, जो लगभग 45 मंजिला इमारत के बराबर है। हर शाम चुनारा सेवक कमर में नया ध्वज बांधकर मंदिर की ऊंची दीवारों और पत्थरों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं। इस दौरान वे किसी आधुनिक सेफ्टी बेल्ट, हार्नेस या सुरक्षा जाल का इस्तेमाल नहीं करते। वे अपने अनुभव, अभ्यास और मजबूत पकड़ के बदौलत इसे पूरा करते है। करीब 20 मिनट की इस चुनौतीपूर्ण चढ़ाई के बाद वे मंदिर के नीलचक्र तक पहुंचते हैं और वहां ध्वज बदलने की परंपरा निभाते हैं।

क्या है मंदिर की पताका बदलने की परंपरा?

महाप्रभु भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन पताका बदलने की खास परंपरा सदियों से चली आ रही है। मंदिर के शिखर पर लगे नीलचक्र के ऊपर इस पवित्र ध्वज को लगाया जाता है। इसे पतितपावन ध्वज या पतितपावन बाना भी कहा जाता है। ध्वज को रोजाना सूर्यास्त के पहले बदला जाता है। ध्वज बदलने की जिम्मेदारी चुनरा सेवायतों की होती है। मौसम चाहे जैसा अभी हो इस परंपरा को निभाने की पूरी कोशिश की जाती है।


ध्वज में बनी गांठ ने खींचा श्रद्धालुओं का ध्यान

ध्वज बदलने की परंपरा के दौरान एक और बात चर्चा में रही। तेज हवाओं के बीच मंदिर की पताका पर गांठ जैसी आकृति दिखाई दी, जिसे देखकर श्रद्धालुओं में उत्सुकता बढ़ गई। धार्मिक मान्यताओं में इसे शून्य ग्रंथि या ब्रह्म गांठ कहा जाता है। कई श्रद्धालु इसे शुभ संकेत मानते हैं। हालांकि, यह केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी मान्यता है, इसका वैज्ञानिक आधार नहीं है। खराब मौसम के बावजूद मंदिर की परंपरा निभाए जाने का दृश्य लोगों को आकर्षित करता रहा। महाप्रभु जगन्नाथ के प्रति भक्तों की आस्था एक बार फिर चर्चा में आ गई।

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