Vijayadashami 2026: दशहरे पर रावण दहन से पहले क्यों होती है देवी अपराजिता की पूजा? जानें धार्मिक महत्व
Vijayadashami 2026: दशहरे पर रावण दहन से पहले देवी अपराजिता की पूजा क्यों की जाती है? जानिए देवी अपराजिता का धार्मिक महत्व, भगवान श्रीराम से जुड़ी मान्यता और पूजा विधि।
Devi Aparajita Puja 2026: विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन जहां भगवान श्रीराम की रावण पर विजय की स्मृति में रावण दहन किया जाता है, वहीं मां दुर्गा की महिषासुर पर जीत का उत्सव भी मनाया जाता है। दशहरे से जुड़ी एक अन्य परंपरा देवी अपराजिता की पूजा भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूजा का संबंध विजय, साहस और जीवन की चुनौतियों पर सफलता प्राप्त करने की कामना से है। आइए जानते हैं कि देवी अपराजिता कौन हैं और विजयादशमी पर उनकी आराधना क्यों विशेष मानी जाती है।
कौन हैं देवी अपराजिता? जानें नाम का अर्थ
हिंदू धार्मिक परंपराओं में देवी अपराजिता को शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है। ‘अपराजिता’ का अर्थ है ऐसी शक्ति जिसे पराजित नहीं किया जा सके। इसी कारण देवी के इस स्वरूप की आराधना साहस, आत्मविश्वास और सफलता की कामना के साथ की जाती है। मान्यता है कि उनकी पूजा व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने और नकारात्मकता से ऊपर उठने की प्रेरणा देती है। विजयादशमी पर उनकी उपासना को नई शुरुआत और अपने लक्ष्यों की ओर आगे बढ़ने के संकल्प से भी जोड़कर देखा जाता है।
भगवान श्रीराम की विजय से क्या है संबंध?
विजयादशमी भगवान श्रीराम की लंकापति रावण पर विजय की याद दिलाती है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, माता सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराने और अधर्म का अंत करने के लिए श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई की थी। दशहरे से जुड़ी कुछ परंपराओं में युद्ध से पहले देवी अपराजिता की आराधना करने की मान्यता भी मिलती है। इस पूजा को दैवी शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने और विजय की कामना करने का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, इस प्रसंग का उल्लेख अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में भिन्न रूपों में मिलता है।
आठों दिशाओं पर विजय का क्या है महत्व?
देवी अपराजिता की पूजा से जुड़ी एक धार्मिक मान्यता आठों दिशाओं में विजय प्राप्त करने की भावना से संबंधित है। कुछ पूजा-विधियों में आठ पंखुड़ियों वाले कमल की आकृति पर देवी का प्रतीक स्थापित कर आराधना करने का विधान बताया जाता है। कमल की आठ पंखुड़ियों को आठों दिशाओं के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इस परंपरा के जरिए जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में आने वाली बाधाओं को दूर करने, कार्यों में सफलता पाने और अपने संकल्पों को पूरा करने की कामना की जाती है।
विजयादशमी पर देवी अपराजिता की पूजा कैसे करें?
दशहरे के दिन देवी अपराजिता की पूजा करने के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को स्वच्छ करें। इसके बाद देवी के चित्र या प्रतीक को श्रद्धापूर्वक स्थापित करें। पूजा में रोली, अक्षत, फूल, धूप और दीपक जैसी सामग्री अर्पित की जा सकती है। इसके बाद देवी का स्मरण करते हुए साहस, धैर्य और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति देने की प्रार्थना करें। पूजा के अंत में आरती करें और प्रसाद अर्पित करें। पूजा की विधि परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
विजयादशमी पर क्यों खास मानी जाती है यह पूजा?
विजयादशमी का संदेश केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बुराइयों पर विजय पाने और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है। देवी अपराजिता की पूजा इसी भावना को मजबूत करने वाली परंपरा मानी जाती है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, उनकी आराधना व्यक्ति को आत्मविश्वास बनाए रखने, कठिनाइयों से न घबराने और अपने उद्देश्य की ओर निरंतर आगे बढ़ने का संकल्प देती है। यही वजह है कि दशहरे पर देवी अपराजिता की पूजा को विजय और शुभ आरंभ से जोड़कर देखा जाता है।