राजनैतिक संकट : ठाणे के दादा ने उद्धव सरकार को घुटनों पर ला दिया?… पूरी कहानी…

अविनाश दुबे,रायपुर। महाराष्ट्र में राजनैतिक संकट घने बादलो जैसा छाया हुआ है. महाविकास अघाड़ी सरकार ने जब शपथ भी नहीं ली थी, तभी उसके गिरने की खबर आई, जब अचानक अजीत पवार के समर्थन के साथ देवेंद्र फडणवीस ने शपथ ले ली. इसके बाद भी कभी किसी हवाई अड्डे के नाम पर तो कभी पंचायत चुनाव में हार-जीत की बात पर खबर आती रही कि महाराष्ट्र में में सरकार गिरने वाली है.

हमेशा बात पत्रकारों की कलम और संपादकीय टिप्पणियों तक के इर्द गिर्द घुमती रही. लेकिन इस बार महाराष्ट्र का राजनैतिक संकट वाकई असली है. महाविकास अघाड़ी सरकार के तकरीबन दो दर्जन विधायक, गुजरात भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटील के शहर सूरत चले गए हैं. और सुबह खबर आई जब ये बागी विधायक रवाना होते दिखाई दिए,बताया जा रहा है अब ये विधायक गुहावाटी जा रहे है. ये टूट महाविकास अघाड़ी की सबसे मज़बूत कड़ी मानी जाने वाली शिवसेना में हुई है.

भारत में सरकार सिर्फ चुनाव से ही नहीं बनती. मैनेजमेंट से भी बनती है. और उसके लिए ज़रूरत पड़ती है एक अदद होटल या रिज़ॉर्ट की. ”सरकार और रिज़ॉर्ट और संकट” – ये तीन शब्द जब एक वाक्य में आ जाते हैं, तो दर्शक भी समझ जाते हैं कि कहानी क्या होने वाली है. बस सूबे का नाम, पार्टियों के नाम और नेताओं के नाम बदलते रहते हैं. आपने रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स नाम की इस वेब सीरीज़ के कई एपिसोड देखे हैं – कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आदि.

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ताज़ा एपिसोड एयर हो रहा है महाराष्ट्र से.
विधायकों के बाड़ेबंद होने की खबर भले आज आई हो, लेकिन महाराष्ट्र में राजनैतिक संकट की आहट बीते दिनों में ही मिलने लगी थी. 20 जून को महाराष्ट्र विधान परिषद के लिए चुनाव हुए. कुल 10 सीटों पर परिषद के सदस्य चुने जाने थे. महाविकास अघाड़ी के तीनों दलों – शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने दो-दो उम्मीदवारों को खड़ा किया. और भाजपा ने पांच उम्मीदवारों को उतारा.

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शिवसेना के दोनों उम्मीदवार आसानी से जीत गए. एनसीपी के भी दोनों उम्मीदवार जीत गए. लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवारों को द्वितीय वरीयता मतों की ज़रूरत पड़ गई. बावजूद इसके पार्टी का दलित चेहरा माने जाने वाले चंद्रकांत हंदोरे हार गए. दूसरी तरफ भाजपा ने अपने पांचों उम्मीदवार जिता लिए. जब सारा गणित सामने आया, तो मालूम चला कि 106 विधायकों वाली भाजपा को कुल 133 मत मिले थे. और इनमें महाराष्ट्र के निर्दलीय विधायकों और छोटी पार्टियों से इतर कम से कम 6 वोट महाविकास अघाड़ी के विधायकों के थे – 3 शिवसेना के और 3 कांग्रेस के. इससे पहले 10 जून के रोज़ भी यही नज़ारा देखने को मिला था.

ध्यान दीजिए, कि महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सदस्य होते हैं और बहुमत का आंकड़ा है 144. लेकिन चूंकि एक सीट रिक्त है और दो विधायक फिलहाल जेल में हैं, इसीलिए सदन में मौजूद सदस्यों की संख्या है 285. इस लिहाज़ से बहुमत का आंकड़ा हो जाता है 143. महाविकास अघाड़ी सरकार के पास अपने तीन घटक दलों में कुल 152 विधायक हैं. इसके अलावा सरकार को कुछ छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी मिला हुआ है. लेकिन जैसा कि दर्शक जानते ही हैं, छोटे दल और निर्दलीय विधायकों के मामले में अंतरात्मा की आवाज़ कभी भी सुर बदल लेती है.

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अब इतना तो आप जानते ही हैं कि फौज में जब बगावत होती है, तो उसकी कमान एक बाग़ी जनरल के हाथ में ही होती है. तो शिवसेना में हुई बगावत के जनरल थे, एकनाथ संभाजी शिंदे. अब ये लाज़मी है कि आप पूछें कि ये एकनाथ शिंदे कौन हैं?

आइए समझते हैं
उद्धव कैबिनेट में एकनाथ शिंदे को शहरी विकास और लोक निर्माण विभाग PWD की ज़िम्मेदारी दी गई. देश के दूसरे सूबों की तरह महाराष्ट्र में भी हर ज़िले के लिए प्रभारी मंत्री बनाए जाते हैं, जिन्हें पालक मंत्री कहा जाता है. शिंदे, ठाणे और गडचिरोली ज़िले के पालक मंत्री हैं. साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले शिंदे एक पुराने शिवसैनिक हैं. मूल रूप से महाराष्ट्र के सतारा के हैं और अब मुंबई के करीब पड़ने वाले ठाणे ज़िले में मज़बूत पकड़ रखते हैं. शुरुआत शाखा प्रमुख रहते हुए की और फिर पार्षद बने. तब तक ठाणे ज़िले के दबंग शिवसैनिक आनंद दिघे का हाथ सिर पर आ गया था. 2001 में दिघे की असमय मृत्यु हुई तो पार्टी ने ठाणे की बागडोर एकनाथ शिंदे को दे दी.

शिंदे ठाणे की कोपरी – पाच पाखडी सीट से चार बार के विधायक हैं. 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना अलग-अलग लड़े थे. तब उद्धव ठाकरे शिंदे को नेता प्रतिपक्ष बनाने वाले थे. लेकिन दोनों पार्टियों ने साथ में सरकार बना ली और एकनाथ शिंदे मंत्री बन गए. माना जाता है कि 2014 में शिंदे उन नेताओं में थे, जो भाजपा के साथ गठबंधन के पक्षधर थे. 2019 में भी एकनाथ शिंदे भाजपा के साथ सरकार बनाने के पक्षधर थे. शिवसेना ने उन्हें विधायक दल का नेता भी चुन लिया था और माना जा रहा था कि शिंदे सीएम तक हो सकते हैं. लेकिन वो सीएम बन नहीं पाए. क्यों?


क्योंकि शरद पवार का कहना था कि गठबंधन उद्धव ठाकरे के नेतृत्व बेहतर काम करेगा. शिंदे ने इस फैसले को एक आदर्श शिवसैनिक की तरह लिया और कैबिनेट में शामिल हुए. बीते ढाई सालों में जब-जब महाराष्ट्र सरकार के सामने कोई संकट आया, तब एकनाथ शिंदे ने उद्धव के दाएं हाथ की तरह काम किया. जब इस पूरे संकट में एकनाथ शिंदे की भूमिका पर सवालों की संख्या काफी बड़ी हो गई, तो उन्होंने एक ट्वीट किया, जो मराठी में था. हम उसका अनुवाद आपको बता देते हैं.

‘’हम बाला साहेब के कट्टर शिवसैनिक हैं. बाला साहब ने हमें हिंदुत्व की शिक्षा दी है. सत्ता के लिए हमने बाला साहेब के विचार और धर्मवीर आनंद दिघे की शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया और न ही भविष्य में करेंगे.”

एकनाथ शिंदे ने इस ट्वीट के ज़रिए शिवसेना के उस भावुक काडर को संबोधित किया था, जिसके लिए बाल ठाकरे एक आइकन हैं और वफादारी सबसे बड़ा मूल्य. एकनाथ शिंदे ने अपने ट्वीट में दो लोगों का ज़िक्र किया. एक हैं बाल ठाकरे, जिनसे दर्शक पहले से परिचित हैं. दुसरे है दिघे, हम आपको यहां आनंद दिघे के बारे में कुछ बातें बता देते हैं. दिघे, शिवसेना के एक बाहुबली नेता थे, जिनकी ठाणे ज़िले में बड़ी पकड़ थी. वो अपना ”दरबार” तक चलाते थे, जिसमें लोगों की छोटी-मोटी शिकायतों का ”त्वरित” निवारण किया जाता था. 2001 में जिस अस्पताल में उनकी हृदयघात से मौत हुई, उसे शिव सैनिकों ने जला दिया था. फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक शिव सैनिकों के उत्पात के चलते जब लाइफ सपोर्ट मशीनों ने काम करना बंद कर दिया, तब एक छह महीने के बच्चे और एक 65 साल के बुज़ुर्ग की भी जान चली गई.

अब आपको ये बताते हैं कि ढाई साल में भाजपा ने दूसरी बार सरकार बनाने की कोशिश किस रणनीति के तहत की. एकनाथ शिंदे के खेमे में ये दावा किया जा रहा है कि उनके साथ शिवसेना के 36 विधायक हैं. ये आंकड़ा इसलिए अहम है कि महाराष्ट्र में शिवसेना के 55 विधायक हैं, और इसका दो तिहाई 36 के करीब होता है. अगर शिंदे ने ये आंकड़ा जुटा लिया तो आगे की कार्रवाई की जाएगी. इससे पहले बीजेपी एक बार ये सीन अजित पवार के साथ देख चुकी है इसलिए अभी कुछ नहीं कह रही, जब वो पूरी तरह से संतुष्ट हो जाएगी तभी कुछ घोषणा होगी.

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दर्शक जानते हैं कि 2019 में एनसीपी विधायकों को वापस लाने में शरद पवार की बड़ी भूमिका थी. इस बार ये काम उद्धव ठाकरे को करना है. क्या उद्धव ठाकरे भी शरद पवार की तरह अपने कुनबे को दोबारा समेट सकते हैं, इस बार पार्टी में दो चीजों को लेकर बगावत है. पहली उद्धव ठाकरे के नेतृत्व को लेकर और दूसरी मौजूदा सरकार में तीन अलग-अलग विचारधाराओं का होना. इस बार शरद पावर कुछ नहीं कर सकते क्योंकि सरकार शिवसेना की वजह से गिर रही है और विधायक भी शिवसेना के ही हैं. इस बार शिंदे ने वही आरोप लगाया है जो पिछले ढाई साल से भाजपा शिवसेना पर लगा रही थी कि पार्टी हिंदुत्व से दूर जा रही है. ये लड़ाई उद्धव ठाकरे के लिए आसान नहीं होगी.

शिवसेना लगातार इस संकट से पार पाने के रास्ते तलाश रही है. कल पार्टी ने अपने दो नेताओं, रवि पाठक और मिलिंद नार्वेकर को सूरत भी भेजा. और दूसरी तरफ संजय राउत प्रेस से ये कहते रहे कि ये संकट उतना बड़ा भी नहीं है. शिवसेना की एक समस्या ये भी है कि NCP इस सब में अपने हाथ नहीं जलाना चाह रही है. कल दोपहर में शरद पवार ने कह भी दिया कि सीएम कौन बने, ये शिवसेना का आंतरिक मामला है. शरद पवार ने हमेशा संयम की राजनीति की है. लेकिन कांग्रेस की तरफ से पृथ्वीराज चौहान ने खुलकर आरोप लगाए.

कल का पूरा दिन मुंबई और दिल्ली में ताबड़तोड़ अपडेट्स का रहा. कभी खबर आती कि भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृहमंत्री अमित शाह से मिले हैं, तो कभी खबर आती कि देवेंद्र फडणवीस को दिल्ली बुला लिया गया. फिर ये मालूम चलता कि कांग्रेस ने आने वाले दिनों में होने वाली हलचल को देखते हुए कमल नाथ को AICC ऑब्ज़र्वर बनाकर महाराष्ट्र भेज दिया है. रही बात शिवसेना की, तो उसने एकनाथ शिंदे को सदन में विधायक दल के नेता के पद से हटा दिया है और अपने पार्टी कार्यालय पर समर्थकों का शक्ति प्रदर्शन भी करवा लिया है. लेकिन इस संकट का कोई ठोस हल उसके पास है, अब तक ऐसे संकेत मिले नहीं हैं. दूसरी तरफ भाजपा इस बार गच्चा खाने के मूड में नहीं हैं. इसीलिए फूंक-फूंक के कदम रख रही है.

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