बिरसा मुंडा बलिदान दिवस : आदिवासियों को दिलाई पहचान, ब्रिटिश शासन की नींव हिला देने वाले बिरसा मुंडा यूं ही नहीं कहलाते जननायक, जानिए उनका इतिहास

नई दिल्ली : आजबिरसा मुंडा की 122 वीं शहादत दिवस मनाया जा रहा है। भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक थे जिन्होंने भारत के झारखंड में अपने क्रांतिकारी चिंतन से 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग की शुरुआत की। बिरसा मुण्डा का जन्म 15 नवम्बर 1875 के दशक में छोटे किसान के गरीब परिवार में हुआ था। मुण्डा एक जनजातीय समूह था जो छोटा नागपुर पठार (झारखण्ड) निवासी था। 

आदिवासियों को दिलाई अपनी पहचान 

बिरसा मुंडा आदिवासियों के जीवन और उनकी संस्कृति को कमतर आंकने वालों के खिलाफ मजबूती से डटे रहे। उन्होंने काले कानूनों को चुनौती देकर बर्बर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी थी। उन्होंने कई अंधविश्वासों को हतोत्साहित किया। उन्होंने आदिवासियों की कई आदतों में सुधार किया और जनजातीय गौरव को बहाल और पुनर्जीवित करने की दिशा में काम किया। यही वजह है कि उनका नाम आज भी पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है।

READ MORE : हसदेव अरण्य में आदिवासियों के लगातार विरोध के बावजूद पेड़ काटे जा रहे, चाहे जान चली जाए अब पेड़ काटने नही देंगे: कोमल हुपेंडी

बिरसा मुंडा ने केवल 25 वर्षों का छोटा, लेकिन बहादुरी से भरा जीवन व्यतीत किया। वीरतापूर्ण कार्यों और उनकी नेक भावना ने बिरसा को उनके अनुयाइयों के लिए भगवान बना दिया। अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने के वीरतापूर्ण प्रयासों से भरी उनकी जीवन कहानी, उपनिवेशिक ब्रिटिश राज के खिलाफ प्रतिरोध की एक बुलंद आवाज का प्रतिनिधित्व करती है। अपने कार्यों और आंदोलन की वजह से बिहार और झारखंड में लोग बिरसा मुंडा को भगवान की तरह पूजते हैं। 

आदिवासियों के लगान माफी के लिए किया आंदोलन

unibots video ads

1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजो से लगान (कर) माफी के लिए आंदोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा मुंडा आदिवासियों के लिए महापुरुष का दर्जा पा चुके थे।  1857 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। 

READ MORE : छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों के हितों के रक्षा के लिए कृतसंकल्पित समाज प्रमुखों से आदिवासियों कोे वनाधिकार पत्र का समुचित लाभ दिलाने के सहयोग करने की अपील की

900 में गिरफ्तार हुए बिरसा मुंडा

जनवरी 1900 डोम्बरी पहाड़ पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत सी औरतें व बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी एक जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों को गिरफ्तार कर लिया गया।  अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर के जमकोपाई जंगल से अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। 

READ MORE : हसदेव मामला, मुख्यमंत्री बघेल का बड़ा बयान, पेड़ काटने को लेकर कही ये बड़ी बात…

कैसे हुआ बिरसा मुंडा का निधन ?

9 जून 1900 को रांची जेल में 25 साल की उम्र में उनका निधन जेल में ही हो गया था। ब्रिटिश सरकार के मुताबिक उनकी मृत्यु हैजा से हुई थी लेकिन उन्होंने बीमारी के किसी लक्षण का कोई प्रमाण नहीं दिखाया। जिसके बाद ये माना जाता है कि शायद उन्हें जहर देकर मारा गया था। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है। वहीं 10 नवंबर 2021 को भारत सरकार ने 15 नवंबर यानी बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। 

Back to top button