त्वरित टिप्पणी QUICK COMMENTS : क्या यही है कका(टाइगर) के जिन्दा होने का मतलब ?

गंगेश द्विवेदी, संपादक 
कुछ दिनो पहले फार्मासिस्ट्स असोसिएशन के एक कार्यक्रम में सीएम भूपेश बघेल ने मजाकिया लहजे में, कका अभी जिन्दा है, कहकर इस बात के संकेत दे दिए थे कि अभी उन्हें कोई सीएम के पद से आसानी से नहीं हटा सकता. भूपेश के इस बयान के बाद से ही राजनीति के जानकारों को इंतजार था, कि ढाई-ढाई साल के सीएम मामले में जल्द फिर कुछ न कुछ होगा. आज जानकारों का इंतजार विधायक बृहस्पत के बयान से ख़त्म हो गया। इसके साथ ही कुछ नए सवालों को भी हवा मिली है। बृहस्पत ने जुलाई माह में टी एस बाबा पर हत्या करवाने जैसा संगीन आरोप लगा कर सबको चौंका दिया था, आरोपों के उस दौर के बीच विधानसभा का मानसून सत्र आयोजित हुआ, जिसमे विधायकों की जांच समिति गठित करने की बात भी उठ गई थी. सत्तापक्ष के विधायक द्वारा सीएम पद के दावेदार मंत्री और सरगुजा क्षेत्र के प्रभावशाली नेता पर इसे हमले को सरगुजा कैंप में सत्तापक्ष की सेंध के रूप में भी देखा गया था। बाबा ने इन आरोपों का संयमित होकर जवाब दिया था और जबतक जांच होगी वे विधानसभा की कार्रवाई में हिस्सा नहीं लेंगे कहकर वे विधानसभा छोड़कर चले गए थे। इसके ठीक बाद बृहस्पत ने भरे सदन में माफ़ी मांग कर घटना का पटाक्षेप किया था।

इस बार भी बृहस्पत ने वरिष्ठ नेता सिंहदेव पर ऐसे वक़्त पर आरोप लगाया है, जब पितृ पक्ष के बाद एक बार फिर ढाई-ढाई साल के सी एम के फॉर्मूले के मुताबिक टी एस बाबा के ताजपोशी की अटकलें तेज हैं. इस बयान के साथ ही कांग्रेस में इस सवाल को भी बल मिला है की कका के जिन्दा होने का मतलब क्या यही है ? जानकारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है की दबंग क्षवि के नेता भूपेश को अपनी कुर्सी बचाने के लिए क्या ऐसे विधायक के बयानों के सहारे की जरूरत है ? इस तरह बार-बार विधायकों का दल लेकर दिल्ली पहुंचना किस बात की ओर इशारा करता है ? विधायकों को लामबंद कर आलकमान के सामने आने का कहीं भूपेश को खामियाजा तो नहीं उठाना पड़ेगा ? कांग्रेस में परमपरागत राजनीति और आलाकमान के फैसला लेने के तरीकों के जानकार इसे भूपेश के लिए अच्छा संकेत नहीं मान रहे। जानकारों का कहना है कमिटमेंट करके फिर आलाकमान के सामने ताकत दिखाना कहीं उन्हें भारी न पड़ जाये। ढाई -ढाई साल के सीएम की अटकले अपनी जगह हैं, लेकिन अब तक के कांग्रेस इतिहास के आलाकमान के फैसलों का विश्लेषण करे तो समझ आएगा कि आलाकमान ने कभी शक्तिप्रदर्शन को बर्दाश्त नहीं किया। पंजाब का ताजा उदाहरण सबके सामने है. सच्चाई यह है की वर्तमान में सत्ता की चाबी भले ही भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस के लम्बे संघर्ष के बाद आई. लेकिन इस पूरे संघर्ष में नेताप्रतिपक्ष रहे टी एस सिंहदेव यानि बाबा ने कंधे से कन्धा मिलकर पूरा सहयोग किया. दोनों की जोड़ी एक समय जय-वीरू की जोड़ी कही जाती थी. इस जोड़ी में दरार तब उभरकर दिखने लगी जब ढाई -ढाई साल के सीएम फॉर्मूले के तहत भूपेश के ढाई साल पूरे हुए और लोगों ने अनुमान लगाना शुरू किया की अब टी एस बाबा की बारी है. इसके साथ ही कांग्रेस दो धड़े में बंटती दिखने लगी। एक धड़ा जिसकी कमान वर्तमान सी एम् भूपेश के साथ थी, जिसमे वे विधायक हैं जिन्हे दो साल के इंतजार कराने के भूपेश ने निगम-मंडल-आयोग में एडजस्ट किया था। 70 में से ऐसे 50 विधायक इस धड़े में दिखने लगे जो पहले दूसरे खेमे के माने जाते थे लेकिन लम्बे इंतजार के बाद सत्ता का सुख भोगने का मौका उन्हें मिल गया था। बाबा के साथ ज्यादातर वही रह गए जो इस दौर में पीछे छूट गए। निगम-मंडल-आयोग में एडजस्टमेन्ट भूपेश ने बहुत स्मार्टली किया। ढाई-ढाई साल के सीएम के फार्मूला की नजर से इस एडजस्टमेन्ट को देखा जाय तो भूपेश निगम-मंडल-आयोग की नियुक्ति में राजनीतिक कुशलता का जबरदस्त उदाहरण पेश किया। जानकारों के मुताबिक कायदे से निगम-मंडल-आयोग में नियुक्ति सत्ता सँभालने के बाद जल्द से जल्द हो जानी चाहिए थी. विधायकों के साथ इनमे उन कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को एडजस्ट करना था जिन्होंने लम्बे संघर्ष में पार्टी का साथ दिया। भूपेश ने यह एडजस्टमेंट दो साल तक टाला। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं, लेकिन एक बड़ा तर्क यह भी राजनीति की फिजाओं में जमकर फूला-फला कि भूपेश में इस एडजस्टमेंट को राजनीती के दांव के रूप में बचा रखा था, अगर ढाई-ढाई साल का फार्मूला सही है, तो भूपेश के पास दो रास्ते थे. पहला समय पूरा होने पर ईमानदारी से सत्ता की चाबी बाबा को सौंप देते, वही दूसरा रास्ता पद में बने रहने के लिए विधायकों का बड़ी संख्या में समर्थन हासिल कर आलाकमान से अलग-अलग कारण बताकर सत्ता परिवर्तन को टालने की पेशकश करते रहना। इसे फूटबाल के उस गेम की तरह से भी समझा जा सकता जिसमे हाफ टाइम के बाद जब कोई टीम एक गोल की बढ़त बना लेती है तो वह गेम को धीमा कर देती है और दूसरे टीम के पास बॉल नहीं जाने देती, अपने खिलाडियों के बीच ही बॉल मूव कराकर समय को नष्ट करती रहती है। कांग्रेस में चल रही राजनीति इस गेम में बिलकुल फिट बैठ रही है। यानि भूपेश ने दूसरा रास्ता चुना और विधायकों का बड़ा समर्थन जुटाकर जितना हो सके सत्ता परिवर्तन को टालने की जुगत में लग गए हैं। जानकारों के मुताबिक अप्रैल 2021 के बाद के घटनाक्रम और आये दिन विधायकों को लेकर दिल्ली जाना इस बाद को बल प्रदान करता है की ढाई साल के सीएम का फार्मूला हवाबाजी नहीं था। अगर यह फार्मूला हवाबाजी नहीं था, तो यह भी माना जा सकता है की निगम-मंडल-आयोग की नियुक्ति में दो साल की देरी करना भूपेश की सोची समझी रणनीति का हिस्सा थी। भूपेश ने पहले तो नियुक्ति में देरी की जिसका असर यह हुआ की इस दौरान विधायक पोस्ट पाने के लिए उनके करीब आते चले गए, इन विधायकों में सरगुजा कैंप के विधायक भी शामिल हो गए। नियुक्ति के छह महीने बाद ही जब ढाई साल के सीएम की अटकलों ने जोर पकड़ना शुरू किया तो सबसे पहले यही विधायक भूपेश के पास लामबंद होने पहुँच गए जिन्हे सत्ता का स्वाद चखने का मौका बस मिल ही पाया था, और सत्ता परिवर्तन की बात होने लगी। सत्ता परिवर्तन के साथ सबसे ज्यादा डर सरगुजा कैंप के उन विधायकों के मन में बैठा, जिन्होंने वहां से किनारा कर अभी-अभी भूपेश खेमे में अपनी जगह बनाई थी, उन्हें साफ दिखने लगा की बाबा सीएम बन गए तो बाकियों का तो पता नहीं लेकिन उन्हें अपने पदों से हाथ जरूर धोना पद जायेगा। बृहस्पत सिंह की उग्रता और टी एस बाबा के खिलाफ सीधे बयानबाजी करना भूपेश के इस दांव की मारक क्षमता को प्रदर्शित करता है. सच्चाई यह है की सत्ता हाथ में आने के बाद ही जय-वीरू में दरार की शुरुवात दिख गई थी जब बाबा की इच्छा के खिलाफ जाकर अमरजीत भगत को भूपेश में अपना मंत्री बना लिया था. बाकियों को निगम मंडल आयोग नियुक्ति के बहाने अपनी तरफ मिला लिया। अभी 19 विधयलक फिर दिल्ली में हैं। भूपेश कह रहे हैं की इसे राजनीती के चश्मे से न देखा जाये, परिणाम क्या आने वाले हैं नवरात्रि में यह तो समय ही बताएगा लेकिन देश-प्रदेश की राजनीति में घट रही घटनाओं को राजनीति के नहीं तो किस चश्मे से देखना चाहिए ?

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