इन नियमों का पितृपक्ष में श्राद्ध (Shradh) करते समय करें पालन, पितर होंगे प्रसन्न

पितृपक्ष में श्राद्ध (Shradh) करने का अत्यंत धार्मिक महत्व है.‍ पुराणों में श्राद्ध (Shradh) के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है.‍ स्कंद पुराण के अनुसार श्राद्ध (Shradh) करने से संतान की प्राप्ति होती है.‍ श्राद्ध (Shradh) करने से पितर प्रसन्न होते हैं और हमें सुख-संपत्ति आदि का आशीर्वाद देते हैं.‍

मनुष्य द्वारा श्राद्ध (Shradh) करने पर ब्राह्मण जब तृप्त होते हैं तो उनकी तृप्ति से पितृगण भी तृप्त होते हैं.‍ पुत्र आदि यदि विधि-विधान से अपने पितरों की तिथि के अनुसार उनका श्राद्ध (Shradh) करते हैं तो उस दिन उनके पितर मनाचाहा भोजन प्राप्त करते हैं.‍ जिस श्राद्ध को करने से व्यक्ति को आयु, बल, यश, विद्या और मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है, उस श्राद्ध को करने के लिए कुछ नियम भी बनाए गये हैं.‍

आइए जानते हैं श्राद्ध से जुड़े कुछ जरूरी नियम –

  • शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध हमेशा अपनी ही भूमि या फिर अपने घर में किया जाना चाहिये.
  • श्राद्ध को किसी तीर्थ या नदी अथवा किसी समुद्र तट पर भी किया जा सकता है.
  • श्राद्ध के लिये हमेशा दक्षिण की ओर ढलान वाली भूमि खोजनी चाहिये क्योंकि दक्षिणायन में पितरों का प्रभुत्व होता है.
  • जिस भूमि पर श्राद्ध किया जाए उसे अच्छी तरह से साफ करके गोबर, गंगा जल आदि से पवित्र करना चाहिए.‍
  • श्राद्ध का अधिकार केवल पुत्र को दिया गया है, यदि न हो तो पुत्री का पुत्र यानि नाती भी श्राद्ध कर सकता है.
  • यदि किसी व्यक्ति के कई पुत्र हों तो उनमें से ज्येष्ठ पुत्र को ही श्राद्ध करने का हक है.
  • यदि किसी का पुत्र न जीवित हो तो उसके अभाव में पौत्र तथा पौत्र के न होने पर प्रपौत्र श्राद्ध कर सकता है. पुत्र व पौत्र की गैर हाजिरी में विधवा स्त्री श्राद्ध कर सकती है परन्तु पत्नी का श्राद्ध पति तभी कर सकता है जब उसे कोई पुत्र न हो.
  • यदि किसी का पुत्र है तो उसे अपनी पत्नी का श्राद्ध नहीं करना चाहिये. ऐसी स्थिति में पुत्र को ही अपनी माता का श्राद्ध करना चाहिये.
  • जिसका कोई पुत्र या नाती आदि न हो तो उसके भाई की सन्तान उसका श्राद्ध कर सकती है.
  • शास्त्रों के अनुसार गोद लिया उत्तराधिकारी भी श्राद्ध करने के लिये योग्य है.‍

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