जनता की कमाई से बनी संपत्तियों की ’मेगा डिस्काउंट सेल’ लगाई मोदी सरकार ने

रायपुर। कांग्रेस के महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन ने केंद्र सरकार की नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन ( NMP ) को लेकर मोदी सरकार (Modi government) पर हमला किया है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार जनता की कमाई से पिछले  60 साल में बनाए गए सार्वजनिक उपक्रमों को किराए के भाव पर बेचने पर आमादा है.  उन्होंने कहा कि सबसे चौंकाने वाली और संदेह में डालने वाली बात यह है कि यह सभी कुछ ‘ गुपचुप तरीके से ‘ तय किया गया. इसके बाद इस निर्णय की घोषणा भी ‘अचानक से ‘ की गई. जिससे सरकार (Modi government) की नीयत पर शक गहराता है.

ढांचागत आधार (Infrastructure) सृजन का तुलनात्मक अवलोकन
NDA की तुलना अगर UPA से ढांचागत आधार के सृजन को लेकर की जाए तो यूपीए के मुकाबले एनडीए का रिकॉर्ड काफी खराब है।

पिछले कुछ सालों में प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर जो भी भाषण दिए हैं, उनका मुख्य केंद्र मुख्य रूप से ढांचागत आधार ही रहा है. लेकिन NDA सरकार की इस बिंदु पर अगर UPA से तुलना की जाए तो NDA का रिकॉर्ड खराब है। Para 1.2 Volume 1 Monetisation Guidebook कहता है।

” 12वीं योजना योजना काल के दौरान ढांचागत आधार में निवेश को 36 लाख करोड़ रुपए समग्रित पर आंका गया. यह जीडीपी का 5.8 प्रतिशत औसत है. वित्तीय वर्ष 2018 और 2019 में यह अनुमान 10 लाख करोड़ पर आ गया.”
12वीं योजना काल जो 2012  से 2017 के बीच था. उस दौरान औसतन 7.20 लाख करोड़ सालाना ढांचागत आधार पर निवेश किया जा रहा था. यह एनडीए शासन काल में 5 लाख करोड़ रुपए पर आ गया है. इससे सभी लोगों की उस शंका को बल मिलता है कि सरकार का मुख्य मुद्दा ढांचागत आधार को बेहतर करना नहीं है. इसका मुख्य उद्देश्य कुछ चुनिंदा  उद्योगपति दोस्तों को उनके कारोबार और व्यापार में एकाधिकार का अवसर प्रदान करना है।

एकाधिकार
बाजार में चुनिंदा कंपनियों की मनमर्जी कायम हो जाएगी. सरकार भले कहती रहेगी की निगरानी के  सौ तरह के उपाय हैं. उसके लिए नियामक संस्थाएं हैं. लेकिन सच इसके विपरीत है। यह हम सीमेंट के क्षेत्र में देख सकते हैं. जहां पर दो तीन कंपनियों का एकाधिकार है. वही बाजार में भाव को तय करते हैं। सरकार के तमाम नियामक प्राधिकरण और मंत्रालय उनके सामने असहाय नजर आते हैं. इससे विभिन्न क्षेत्रों में मूल्य निर्धारण और गठजोड़ बढ़ेगा।

इस तरह की स्थिति इंग्लैंड बैंकिंग क्षेत्र में देख चुका है. इस मामले में हम अमेरिका से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं. जो फेसबुक, गूगल और अमेजॉन जैसी संस्थाओं पर नियंत्रण के लिए विभिन्न तरह के नियम और कानून बना रहा है. इसमें उनकी संसद और सभी नेता एक साथ नजर आते हैं। इसकी वजह यह है कि इन कंपनियों का बाजार पर वहां एकाधिकार है. इसी तरह की स्थिति चीन में भी है. वहां पर कुछ टेक कंपनियों पर शिकंजा कसने के लिए चीन की सरकार कई तरह के कदम उठा रही है।

इसकी वजह यह है कि यह कंपनियां इतनी बड़ी हो गई है कि इनके लिए कानून बनाना चीन की सरकार के लिए भी मुश्किल हो रहा है. दक्षिण कोरिया भी अपने यहां पर इसी तरह से एकाधिकार के खिलाफ कार्य कर रहा है। लेकिन भारत में स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है। यहां पर मोदी सरकार कुछ चुनिंदा कंपनियों को एकाधिकार का रास्ता स्वयं बनाकर दे रही है. अगर सरकार(Modi government) की बात मानी भी जाए कि किसी क्षेत्र में दो या तीन कंपनियां होंगी. उसके बाद भी उनके बीच गठजोड़ को कैसे सरकार रोक पाएगी. जब चुनिंदा कंपनियां बाजार में रहेंगी तो गठजोड़ और मूल्य वृद्धि होना तय है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button